TibetanGrace

आपके प्रत्येक दिवसके सत्संग सुननेके पश्चात मैं आपके पहलेके सत्संग भी सुन रहा हूं । इन सत्संगोंमेंसे एक सत्संगके सन्दर्भमे मुझे एक शंका है ।
यदि कोई व्यक्ति घरमें भोजन नहीं बना सकता हो या भोजन बनानेवाला कोई उसके घरमें न होनेके कारण बाहरसे खाना लाकर खाता हो तो ऐसे बाहरसे लाए भोजनके सन्दर्भमें हमें क्या करना चाहिए; क्योंकि वह खाना किसने बनाया है, कैसे बनाया है ?, इसका पता नहीं चलेगा । उदाहरण हेतु अनेक विद्यार्थी शिक्षण हेतु अपने घरसे दूर अकेले रहते हैं । वे अपना खाना डिब्बेमे मंगवाकर खाते हैं । और मेरे जैसे भी कुछ लोग होंगे जिनके घरमें मां है; परन्तु बढती आयुके कारण वो खाना नहीं बना सकती । तो ऐसे लोग बाहरसे लाए भोजनके सम्बन्धमें क्या करें ? हम जो अन्न ग्रहण करते है, उसका हमारी बुद्धि, विचार और परिणामस्वरूप आचारपर बहुत प्रभाव पडता है, यह मैंने पढा था । तबसे यह शंका मेरे मनमें कई वर्षोंसे थी । - वैभव देशपाण्डे


उत्तर : समष्टि हेतु भी यह प्रश्न बहुत अच्छा है; इसलिए इसे सभीके साथ साझा कर रही हूं । अन्नका हमारे मनपर निश्चित ही प्रभाव पडता है । कहावत भी है ‘जैसा खाए अन्न वैसा रहे मन !’ यदि हम बाहरका अन्न खाते हैं तो निम्नलिखित बातोंका पालन कर सकते हैं –

१. बाहरसे बना मांसाहार भूलसे भी ग्रहण न करें ! आपको तो ज्ञात ही होगा कि ‘क्फ्क’ जैसे प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानके भी मांसाहार दूषित एवं वर्जित पशुओंके पाए गए हैं । इसलिए चिकन मटन भूलसे भी न खाएं । मांसाहरमें चिकेन सबसे अधिक तामसिक होता है ।
२. बाहरके भोजन ग्रहण करनेसे पूर्व भोजन मन्त्र बोलकर प्रार्थना करें और आर्ततासे ईश्वरको बाहरके भोजन ग्रहण करनेकी अपनी विवशता बताएं
भोजन मन्त्र इस प्रकार बोलें –
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।

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ॐ सहना भवतु सहनो भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वीनावधीतामस्तु माविद्विषावहै ॥ ॐ शांति: ! शांति: ! शांतिः !

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३. भोजन मन्त्र बोलनेके पश्चात जलसे थालीके चारो ओर कवच बनाएं । यदि आपके पास किसी यज्ञकी विभूति हो तो उसे चुटकी भर छिडक सकते हैं । आप ईश्वरका महाप्रसाद ही ग्रहण कर रहे हैं इस भावसे उसे ग्रहण करें, इससे उसकी अशुद्धि दूर हो जाती है । धर्मप्रसारके मध्य मैं अनेक बार ऐसे घरोंपर रही जहांकी स्त्रियां शुचिताका पालन भोजन बनाते समय नहीं करती थीं और जब मेरे पास वे भोजन लाकर देती थीं तो उसके ऊपर एक छ: से आठ इंचका सूक्ष्मसे काला आवरण होता था । मैं एक कर्मकाण्डी हिन्दू परिवारसे थी जहां हमारे माता-पिताने हमें कभी भी बाहर कुछ खाने नहीं देते थे कि हमारे संस्कार दूषित हो जाएंगे, ऐसेमें भोजनके सम्बन्धमें ऐसी अनुभूति लेनेके पश्चात भोजन करना बहुत कठिन होता है; किन्तु जैसे ही मैं अपने श्रीगुरुसे प्रार्थना करती थी तो काला आवरण नष्ट हो जाता था और उसके ऊपर सूक्ष्म पीले रंगका कवच दिखाई देता था और मेरा मन गुरुके प्रति कृतज्ञतासे भर उठता था । मैं एक भिक्षुणी हूं और धर्मप्रसारके मध्य जो भिक्षामें मिलता है उसे प्रेमसे और कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करना मेरा धर्म है इसी भावसे उसे ग्रहण करती थी । वैसे ही अपनी परिस्थिति ईश्वरको बताएं, वे अवश्य हमारी सहायता करेंगे ।
४. भोजन करते समय दूरदर्शन संचपर तामसिक कार्यक्रम न देखें अपितु नामजप करते हुए उसे प्रसाद समझकर ग्रहण करें ।
५. अन्न ग्रहण करनेके पश्चात ईश्वरको प्रसाद देने हेतु कृतज्ञता व्यक्त करते हुए यह श्लोक बोलें –
अन्नाद भवन्ति भूतानि पर्जन्याद अन्नसम्भवः ।
यज्ञाद भवति पर्जन्यॊ यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।।

इसे करनेसे बाहरके बने भोजनकी अशुद्धि दूर हो जाती है । – तनुजा ठाकुर



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