साधना

साधनाके विविध दृष्टिकोण


प्रार्थना, आरम्भिक अवस्थामें शब्दजन्य होती है और साधनाकी प्रगत अवस्थामें वह नि:शब्द हो जाती है अर्थात प्रार्थनाके समय मात्र शरणागत भाव रह जाता है ।

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साधना क्यों करें ? (भाग – ११)


साधक माता-पिताके घरमें जन्म लेने हेतु जीवात्माओंकी होड लगी रहती है । वहीं जो माता-पिता साधना नहीं करते हैं, उनके घरमें जीवात्माएं जन्म ही नहीं लेना चाहती हैं, उन्हें ज्ञात होता है कि ऐसे घरोंमें जन्म लेनेका अर्थ है, दुःख भोगना और…….

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धर्म एवं साधनाविहीन व्यक्तियोंको वृद्धावस्थामें सन्तानोंसे मिलता है अधिक दुःख !


एक सेवानिवृत्त व्यक्ति हमारे सत्संगमें आए थे । सत्संग समाप्त होनेपर वे अपने पुत्रसे कैसे त्रस्त हैं ?, यह बताने लगे । मैंने उनसे पूछा, “क्या आप साधना करते हैं ?, तो उन्होंने कहा, “मुझे अपनी चाकरीसे (नौकरीसे) कभी समय ही नहीं मिला !” जो कहते हैं कि साधना करने हेतु समय नहीं मिला, वस्तुत: […]

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साधना क्यों करें ? (भाग – ८)


प्रारब्ध अर्थात पूर्व जन्मके कुल कर्मफलका वह भाग, जिसे हम इस जन्ममें भोगने हेतु लेकर आते हैं । हमारे श्रीगुरुके प्रारब्धके कष्टोंकी तीव्रताके अनुसार उसे तीन श्रेणीमें विभाजित किया जा सकता है –
साधारण, मध्यम एवं तीव्र….

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साधना क्यों करें ? (भाग – ७)


मनका मुख्य कार्य चिन्ता करना है, अपनी अस्थिर वृत्तिके कारण एक स्थानपर उसी प्रकार स्थिर नहीं रहता जैसे बद्ध सिंह अपने पिंजरेमें अस्थिर रहता है । 
 वस्तुत: मनकी परिभाषा ही है कि वह संस्कारोंका एक पुञ्ज मात्र है…..

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साधना क्यों करें ? (भाग – ६)


चाहे कोई विद्यार्थी हो या गृहस्थ या सन्यासी हो, सभीके लिए एकाग्र मनकी आवश्यकता होती है और मनको एकाग्र करने हेतु आधुनिक विज्ञानने आज तक कोई औषधि नहीं बनाई है…..

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साधना क्यों करें ? (भाग – ५)


सुख और दुःखसे परेकी अवस्थाको ‘आनन्द’ कहते हैं । सतत सुख पानेकी इच्छा प्रत्येक जीवमात्रमें होती है; क्योंकि प्रत्येक जीवकी निर्मिति उस सत-चित-आनन्द स्वरूपी ब्रह्मसे हुई है; अतः अपने मूलकी ओर जानेका आकर्षण सभी जीवोंमें होता है……

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साधना क्यों करें ? (भाग – ४)


आज सामान्य व्यक्तिके जीवनमें बुद्धि अगम्य कारणोंसे कष्टके प्रमाणमें अत्यधिक वृद्धि हुई है और इसके पीछे मूलभूत कारण है, धर्माचरण एवं साधनाका अभाव है ।  हमारे श्रीगुरुके अनुसार वर्तमान समयमें सामान्य व्यक्तिके जीवनमें ८० % समस्याओंका मूल कारण आध्यात्मिक होता है…..

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कलियुगमें समष्टि साधनाका अधिक महत्त्व


कलियुगमें धर्मका एक ही अंग व्याप्त होनेके कारण समष्टि साधनाका महत्त्व ७० प्रतिशत है एवं व्यष्टि साधनाका महत्त्व ३० प्रतिशत है । व्यष्टि साधना अर्थात स्वयंकी कोई इच्छा पूर्ति या स्वयंकी आध्यात्मिक प्रगतिके उद्देश्यसे की जानेवाली साधना एवं समष्टि साधनाका अर्थ है, समाजको धर्मपालन एवं साधनाकी ओर उन्मुख करने हेतु किये जानेवाले प्रयत्न ! श्रीगर्गसंहिताके […]

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साधना क्यों करें ? (भाग – ३)


साधनासे सकाम और निष्काम दोनों ही ध्येयकी पूर्ति होती है; अतः यह लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही सुखकी इच्छा रखनेवालोंके लिए उपयोगी है । साधना करनेसे मनुष्य जीवन सार्थक होता है, अर्थात मनुष्यके जन्म लेनेका मूलभूत उद्देश्य पूर्ण होता है ।

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