क्यों करते हैं किसान आत्महत्या ?


अनादिकालसे हमारा देश कृषि प्रधान देश रहा है । जब इस देशका किसान समृद्ध था तब यह देश ‘सोनेकी चिडिया’ कहलाता था । मुसलमान आक्रान्ताओंने इस देशके किसानोंपर करोंका बोझ लादनेका क्रम आरम्भ किया और उसके पश्चात् अंग्रेजोंके उत्पीडनने किसानोंकी स्थिति और विकट कर दी; किन्तु स्वतन्त्रता पश्चात् किसानोंकी स्थितिमें कोई भी सुधार नहीं हुआ है एवं किसानोंकी आत्महत्या अब किसीको चौंकाती नहीं है; अपितु अन्नदाताकी इतनी बडी संख्यामें होनेवाली आत्महत्याओंको रोकने हेतु अबतक कोई ठोस उपाय योजनाका नहीं निकाला जाना, इस देशके राज्यकर्ताओंकी, उनके प्रति निष्ठुरताको स्पष्ट दर्शाता है । ‘राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय’द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकडोंके अनुसार १९९५ से २०११ के मध्य अर्थात् १७ वर्षें ७ लाख, ५० हजार, ८६० किसानोंने आत्महत्या की है ! वर्ष २०१४ से २०१५ के मध्य किसानोंकी आत्महत्याओेंमें ४१.७ प्रतिशतकी वृद्धि हुई है ! २००१ की जनगणनाके आंकडे बताते हैं कि पिछले दस वर्षों ७० लाख किसानोंने खेती करना बन्द कर दिया ! क्या यह इस देशके लिए शुभ सन्देश है ? किसानोंके आत्महत्याका क्रम १९९० के दशकसे महाराष्ट्रसे आरम्भ हुआ, जो अब देशके अनेक राज्योंतक फैल चुका है । किसान बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक औषधियों एवं छोटे क्षेत्रफलकी भूमिके स्वामी होनेके कारण अपनी आर्थिक आवश्यकताओंकी पूर्ति नहीं कर पाते हैं और वे ऋण लेते हैं । सूखा, बाढ, पाला, फसलोंके रोग, कीडों, अग्नि (आगजनी) व पशुओं इत्यादिके कारण किसानोंको अधिकतर लाभके स्थानपर हानि उठानी पडती है; ऊपरसे ‘सूदखोर’ महाजनोंका मकडजाल, जो बैंककी अपेक्षा तीन गुना अधिक ब्याज लेते हैं, वह किसानोंको उनकी आर्थिक दरिद्रतासे बाहर नहीं निकलने देता; किन्तु मूलत: किसानोंकी उपजके लिए अपर्याप्त और न्यून (कम) क्रय मूल्य वर्तमान कृषिसंकटका आधार है और इससे निराश होकर वे न केवल अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं; अपितु अपने पूरे परिवारको मृत्युकी नींद सुला देते हैं । विकासकी डींगें हांकनेवाले अभीतकके सर्व राजनीतिक पक्ष किसानोंकी खेती हेतु उचित सिंचाई व्यवस्था करनेमें भी असक्षम रही हैं । किसानोंको सहायता पहुंचानेके लिए केन्द्र और राज्य शासन, दोनों एकदूसरेपर उत्तरदायित्व डालते हैं और वे किसानोंकी आत्महत्याओं और उन्हें दी जानेवाली सहायताको लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकने लग जाते हैं । किसानके ऋणमें डूबने या घाटेमें जानेका एक और बडा कारण है, खेतोंमें कीटनाशकका छिडकाव ! कीटनाशक और रासायनिक उर्वरकका प्रयोग अल्प भूमिमें अधिक फसल करनेके नामपर आरम्भ किया गया था । जिसे ‘हरित क्रान्ति’का नाम दिया गया था । इस हरित क्रन्तिने किसान, फसल और सामान्य लोगोंके जीवनमें विष घोलनेका कार्य किया, इनको प्रयोग करना विवशता बन चुकी है । यदि ये सब न हो तो किसानकी खेतीका लागत मूल्य इतना अधिक नहीं बढेगा और अब तुरन्त इसका उपाय जैविक उर्वरक आधारित खेती नहीं हो सकती; क्योंकि भूमिको पुनः ठीक होनेमें ३ से ४ वर्षका समय लग जाता है । कृषि हमारी देशकी अर्थव्यवस्थाका आधार है; अतः किसानोंके विकासका उत्तरदायित्व राज्यकर्ताओंके लिए प्राथमिकता होनी चाहिए थी । कृषिको हरित क्रान्तिके नामपर दिशाहीन किया गया । यदि कृषि देसी गोवंश आधारित होती, सिंचाईं व्यवस्थाको प्राथमिकता दी जाती, किसानोंको उसकी उपजका उचित मूल्य मिलता और मध्यस्थों और महाजनोंके चुंगलसे वे मुक्त रहते तो कृषक आत्महत्या क्यों करते ? यथार्थमें इस देशमें अब राज्यकर्ताओंके लिए ‘जय जवान जय किसान’के घोषवाक्यका (नारे) कोई अर्थ नहीं रहा । अब ‘मरे जवान मरे किसान; किन्तु हम करते रहेंगे, आ गए अच्छे दिनका गुणगान’ यह घोषवाक्य चरितार्थ हो रहा है ! इस दुर्दिनको शीघ्र दूर करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना, अब एकमात्र पर्याय रह गया है । – तनुजा ठाकुर



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