शासनकी भयानक लापरवाही, बस्तियां बसाकर रह रहे सहस्रों बांग्‍लादेशी, नहीं हो रही कार्यवाही !!


मई ३०, २०१९

उत्तरप्रदेशके आगरामें बांग्लादेशियोंकी भरमार है । कई दशक पूर्वसे झोपडियोंमें रहनेवाले इन परिवारोंने बोली सीखकर अब आधारकार्ड और राशनकार्ड बनवाकर यहींकी नागरिकता भी प्राप्त कर ली है और अब वोट भी दे रहे हैं !!

एत्माद्दौलाके यमुना ब्रिजके पास पांच दशकसे इसीप्रकारकी बस्ती बसी हुई है । १५० झोपडियोंमें रहनेवाले इन लोगोंका रहन-सहन वर्षों पुराना है; परन्तु भाषा बदल गई है । गोपी झोंपडी, मारवाडी इंद्रा नगरके नामसे इस बस्तीको आधार कार्डमें पहचान मिल चुकी है । इनमें दो सहस्रसे अधिक लोग रहते हैं; परन्तु इनकी सत्यता कोई नहीं जानता । इसके पश्चात भी पुलिस और गुप्तचर विभागोंको इनपर कोई शंका नहीं है । इन्होंने लोकसभा चुनावमें अपने मताधिकारका भी प्रयोग किया । गोपी झोंपडीकी भांति सिकंदरा, सदर और रकाबगंजके बिजलीघरमें बस्तियां हैं । इनमें सहस्रों लोग रहते हैं, जिनका पुलिसने अभीतक सत्यापन नहीं किया है ।

इन बस्तियोंमें रहनेवाले महिला और पुरुषोंके साथ बच्चे कबाड बीननेमें लगे रहते हैं । इससे ऊपर उठ चुके कुछ लोग अब फेरी लगाकर नगरके भिन्न-२ क्षेत्रोंमें सामान विक्रय करते हैं ।

सिकंदराके रुनकताकी कबाड बस्तीमें रहनेवाला सईदउल गाजी १२ अक्टूबर २०१८ को बन्दी बनाकर विदेशी अधिनियममें पत्नी और बच्चे सहित कारावास भेजा था । उसकी एक पुत्री बस्तीमें रह गई थी । आठ -दस अन्य बांग्लादेशी परिवार यहां रहकर कबाडका कार्य करते थे । गाजीके कारावास जानेके पश्चात पूरी बस्ती रिक्त हो गई । उसका कबाडका सामान खेत स्वामीने शेष किराएमें विक्रय कर दिया ।

१६ फरवरी २०१७ को एत्माद्दौलाके सुशील नगरसे एनआइएने फातिमाको बन्दी बनाया । बांग्लादेशी फातिमा नकली नोटोंके गिरोहसे जुडी थी; परन्तु न तो पुलिसको इसकी जानकारी थी और न ही स्थानीय लोगोंको । पकडे जानेके पश्चात उसका यह रहस्य उजागर हो गया । पुलिसने अपने स्तरसे कोई जांच नहीं की । अभी एनआइए, प्रकारणकी जांचमें लगी है ।

९ फरवरी २०१६ को गुप्तचर विभागने सदरके बुंदू कटरामें एक डेरेपर छापा मारकर मोहम्मद जोयनल निवासी जनपद बागरहट, बांग्लादेश और मेहताब विश्वास निवासी जनपद गोपालगंज, बांग्लादेशको बन्दी बना लिया । स्थानीय गुप्तचर इकाईकी (एलआइयूकी) ओरसे सदर थानेमें बिना पारपत्रके (पासपोर्टके) यहां रहने और १४ विदेशी अधिनियमके अन्तर्गत अभियोग प्रविष्ट करनेके पश्चात उन्हें कारावास भेज दिया । ये भ्रमणभाषपर पाकिस्तानसे सम्पर्कमें थे । इसके पश्चात पुलिस उनके नेटवर्कको नहीं खोल सकी ।

२५ मार्च २०१३ को सेना पुलिसने एडीआरडीई कार्यालयकी सीमाके निकट एक संदिग्ध युवकको सेना पुलिसने पकड लिया । गुप्तचर दलकी पूछताछमें उसने अपना नाम लुकपर पुत्र अदीम अली बताया । वह बांग्लादेश बटमल जनपदमें सुदपुर गांवका रहनेवाला था । उसे कारावास भेज दिया गया; परन्तु उसके सम्पर्क कहां तक थे ?, पुलिस ज्ञात नहीं कर सकी ।

नगरके एत्माद्दौला, सदर, सिकंदरा और रकाबगंज थानोंमें घुसपैठियोंकी बस्ती हैं; परन्तु पुलिसके ब्यौरेमें कुछ नहीं है । न तो बीट सिपाही इनको देखता है और न ही दारोगा । इनकी गतिविधियोंपर भी कोई दृष्टि नहीं रखी जा रही है । पुलिसके कारण वे अब यहांके नागरिक बनते जा रहे हैं, जिससे उन्हें बांग्लादेशी प्रमाणित करना ही कठिन हो रहा है ।

“बांग्लादेशी खुलेमें इस देशमें घूम रहे हैं और पुलिस कुछ कर नहीं पा रही है !! या यूं कहें कि पुलिसको कुछ करनेको कहा नहीं जा रहा है; क्योंकि हमारी पुलिस सामान्यतः स्वसंचालित नहीं रहती है । दैनिक जागरणका यह समाचार हमारी समूची व्यवस्थापर प्रश्न चिह्न लगा रहा है । पुलिस पकड नहीं पा रही और बांग्लादेशियोंको आधारकार्ड और मताधिकार कैसे मिल गया ? गुप्तचर विभागकी दृष्टि कैसे नहीं जा रही ? आए दिन आतंकी घटनाओंके दंश झेलनेवाला या प्रतीक्षा करता यह देश ईश्वर भरोसे ही चल रहा है; क्योंकि इन सबको देखकर तो नहीं लगता है कि कोई बांग्लादेशियोंको बाहर भगानेमें गम्भीर है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

स्रोत : जागरण



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