आयुर्वेद अपनाएं स्वस्थ रहें (भाग – २७.१)


करेला (वानस्पतिक नाम – मिमोर्डिका करन्शिया; अंग्रेजी नाम – BITTER GOURD; संस्कृत नाम – कारवेल्लम्, कटफला, उग्रकाण्ड) एक ऐसा शाक (सब्जी) है, जिसे कुछ लोग ही खाना पसन्द करते हैं; परन्तु करेलेमें जितने गुण हैं, वो सम्भवतः ही किसी शाकमें हों । करेला हरित वर्णका (हरे रंगका) होता है और यह बेलके रूपमें लगता है । इसके भीतर श्वेत वर्णके बीज होते हैं । यह एक ऐसा शाक है, जिसे कई औषधियोंमें प्रयोग किया जाता है ।  इसकी सतहपर उभरे हुए दाने होते हैं । करेलेका जन्म-स्थान उष्ण क्षेत्र अफ्रीका तथा चीन माने जाते हैं । भारतमें इसकी जंगली प्रजाति आज भी उत्पन्न होती है । करेलेकी कृषि समूचे भारतमें की जाती है ।
घटक – इसमें ‘प्रोटीन’, ‘कार्बोहाइड्रेट’, ‘फायबर’, ‘पोटैशियम’, ‘जिंक’, ‘मैग्नेशियम’, ‘फॉस्फोरस’, ‘कैल्शियम’, लोहा, तांबा और ‘मैंगनीज’ पाए जाते हैं । इसके अतिरिक्त इसमें ‘विटामिन – सी, ए और बी’की प्रचुर मात्रा होती है । ‘विटामिन-बी’ समूहके ‘फोलेट’, ‘थायमिन’, ‘नियासिन’, ‘राइबोफ्लेविन’, ‘पैण्टोथेनिक अम्ल’ आदि भी इसमें पाए जाते हैं । इनके अतिरिक्त इसमें ‘कॉलिन’, ‘ल्यूटेन’, ‘बीटा कैरोटीन’, ‘फिटो- न्युट्रिएंट्स’ तथा आक्सीकरणरोधी तत्त्व होते हैं । इसमें ‘फेनोलिक अम्ल’, ‘सैपोनिन’, ‘एल्कलॉइड’, ‘पेप्टाइड’ आदि तत्त्व होते हैं।
औषधियोंमें उपयोग  : होमिओपैथीकी औषधि ‘मोमर्दिया कैरेन्टिया’ करेलेसे बनाई जाती है । करेलेका उपयोग पारम्परिक चीनी औषधियोंमें (‘टी.सी.एम.’में) किया जाता है, जो मोटापा और मधुमेह ‘टाइप-२’के उपचारके लिए प्रयोग की जाती है । आयुर्वेदमें करेलेको सुखाकर इसका चूर्ण बनाकर औषधिके रूपमें प्रयोग किया जाता है ।
   प्रकृति व भिन्न प्रकारके करेले :  स्वस्थ रहनेके लिए खट्टे, मीठे, कसैले, तीखे रसकी आवश्यकता होती है, उसीप्रकार तिक्त (कडवे) रसकी आवश्यकता भी शरीरको होती है । स्वस्थ शरीरके लिए रसकी उचित मात्राकी आवश्यकता होती है । इसमेंसे किसी भी रसके अभाव होनेपर शरीरमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं । करेला वात विकार, पाण्डु, प्रमेह एवं कृमिनाशक होता है । बडे करेलेके सेवनसे प्रमेह, पीलिया और आफरा(पेट फूलनेकी क्रिया)में लाभ मिलता है । छोटा करेला बडे करेलेकी तुलनामें अधिक गुणकारी होता है । करेला कुछ उष्ण, भेदक, हल्का, तिक्त व वातकारक होता है और ज्वर, पित्त, कफ रूधिर विकार, पाण्डुरोग (पीलिया), प्रमेह (गोनोरिया) और कृमि रोगका नाश भी करता है ।
‘भाग २७.२’में हम करेलेकी सेवन विधि व कुछ लाभोंके विषयमें जानेंगें ।



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