देवर्षि नारद मुनि


Back to Godhead - Volume 01, Number 61 - 1973नारद मुनि हिन्दू शास्त्रोंके अनुसार, ब्रह्माके सात मानस पुत्रोंमेंसे एक माने गए हैं । ये भगवान विष्णुके अनन्य भक्तोंमेंसे एक माने जाते है । ये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवोंके परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं । ये प्रत्येक युगमें भगवानकी भक्ति और उनकी महिमाका विस्तार करते हुए लोक-कल्याणके लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं । भक्ति तथा संकीर्तनके ये आद्य-आचार्य हैं । इनकी वीणा भगवन जप ‘महती’के नामसे विख्यात है । उससे ‘नारायण-नारायण’की ध्वनि निकलती रहती है । ये ब्रह्म-मुहूर्तमें सभी जीवोंकी गति देखते हैं और अजर–अमर हैं । भगवद-भक्तिकी स्थापना तथा प्रचारके लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है । उन्होंने कठिन तपस्यासे ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है । देवर्षि नारद धर्मके प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं । इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाजके सभी वर्गोमें नारदजीका सदासे प्रवेश रहा है । मात्र देवताओंने ही नहीं, वरन् दानवोंने भी उन्हें सदैव आदर दिया है । समय-समयपर सभीने उनसे परामर्श लिया है ।
नारद मुनिकी चारित्रिक विशिष्टताओंका पार नहीं है । नारदका स्वभाव ‘कलहप्रिय’ कहा गया है । व्यवहारमें खटपटी व्यक्तिको, एक दूसरेके मध्य झगडा लगानेवाले व्यक्तिको अनेक व्यक्ति नारद कहते हैं; परन्तु नारद कलहप्रिय नहीं वरन वृतान्तोंका वहन करनेवाले, एक विचारक थे । देवर्षि नारद व्यास, महर्षि बाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव आदिके गुरु हैं । श्रीमद्भागवत, जो भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्यका परमोपदेशक ग्रन्थ-रत्न है तथा रामायण, जो मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामके पावन, आदर्श चरित्रसे परिपूर्ण है, देवर्षि नारदजीकी कृपासे ही हमें प्राप्त हो सके हैं । इन्होंने ही प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अम्बरीष आदि महान भक्तोंको भक्ति मार्गमें प्रवृत्त किया । ये भागवत धर्मके परम-गूढ रहस्यको जाननेवाले- ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, महर्षि कपिल, स्वयम्भू मनु आदि बारह आचार्योंमें अन्यतम हैं । देवर्षि नारदद्वारा विरचित भक्तिसूत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है |
नारद श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष, योग आदि अनेक शास्त्रोंमें पारंगत थे । नारद आत्मज्ञानी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, त्रिकाल ज्ञानी, वीणाद्वारा निरन्तर प्रभु भक्तिके प्रचारक, दक्ष, मेधावी, निर्भय, विनयशील, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, स्थितप्रज्ञ, तपस्वी, चारों पुरुषार्थके ज्ञाता, परमयोगी, सूर्यके समान, त्रिलोकी पर्यटक, वायुके समान सभी युगों, समाजों और लोकोंमें विचरण करनेवाले, वशमें किए हुए मनवाले नीतिज्ञ, अप्रमादी, आनन्दरत, कवि, प्राणियोंपर नि:स्वार्थ प्रीति रखनेवाले, देव, मनुष्य, राक्षस सभी लोकोंमें सम्मान पानेवाले देवता तथापि ऋषित्व प्राप्त देवर्षि थे ।



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