घरका वैद्य – शकरकन्द (भाग-३)


७. कर्करोगमें (कैंसरमें) : शकरकन्दमें ‘बीटा-कैरोटीन’, आक्सीकरणरोधी (एंटीऑक्सीडेंट) और कर्करोगरोधी (एंटी कार्सिनोजेनिक) पदार्थ होते हैं, जिससे कर्करोगसे सुरक्षा सम्भव है ।
८. गठियामें : इसमें विद्यमान ‘बीटा-कैरोटीन’, ‘मैग्नीशियम’, ‘जिंक’ और ‘विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स’ गठियाके उपचारके लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं । गठिया सम्बन्धित वेदनाको न्यून करनेके लिए जिस जलमें मीठे आलूको उबाला गया हो, उस पानीको जोडोंपर लगानेसे गठियाकी वेदना न्यून हो जाती है ।
९. पाचनमें : साधारण आलूकी तुलनामें मीठे आलुओंमें अधिक ‘फाइबर’ होता है । साथ ही इनमें ‘मैग्नीशियम’ होता है । इन कारणोंसे यह पाचनके लिए अत्यधिक उत्कृष्ट खाद्य पदार्थ है । मीठे आलूमें ‘स्टार्च’ पाया जाता है, जो इन्हें पचनेमें सहायता करता है । मीठे आलू पेट और आंतोंके लिए सुखदायक होते हैं; इसलिए इन्हें पचानेमें किसी भी प्रकारकी समस्या नहीं होती है और ये आपके पाचनको भी अच्छा रखते हैं ।
सावधानियां : शकरकन्दके प्रयोगमें निम्नलिखित सावधानियां रखनी चाहिए,जिससे इसका पूर्ण लाभ लिया जा सके –
१. अधिक शकरकन्द खानेसे वृक्कमें (गुर्देमें) पथरी भी हो सकती है; क्योंकि इसके भीतर
आपको ‘ऑक्सलेट’, ‘कैल्शियम-ऑक्सलेट’ मिलता है; अतः इसका सीमित मात्रामें इसका सेवन करना चाहिए ।
२. शकरकन्द उन लोगोंको नहीं खाना चाहिए, जिनके वृक्क (गुर्दे) कार्यरत नहीं हैं अथवा रोगग्रस्त हैं । ऐसे लोगोंको शकरकन्दका सेवन चिकित्सकके परामर्श लेनेके पश्चात ही करना चाहिए ।
३. कुछ लोगोंको उदर वेदना (पेट दर्द) रहती है या उनका अमाशय शीघ्र ही रोगग्रस्त हो जाता है, ऐसे लोगोंको भी शकरकन्दका सेवन नहीं करना चाहिए ।


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