धर्मका महत्त्व

अविज्ञाय नरो धर्मं दुःखमायाति याति च ।
मनुष्य जन्म साफल्यं केवलं धर्मसाधनम् ॥
अर्थ : धर्मको न जानकर मनुष्य दुःखी होता है । धर्मका आचरण करनेसे ही मनुष्य जन्म यशस्वी होता है ।

 

 

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सर्व पंथ एवं सम्प्रदाय ऐसे तथाकथित आधुनिक वैद्यों समान हैं, जिन्हें एक ही औषधि ज्ञात हो । वे केवल एक ही प्रकारकी साधना बताते हैं । इसके विपरीत धर्म, जितने व्यक्ति उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग इस तत्त्वानुसार साधना बताता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

उपासना कार्य

सात्त्विक जप

मां दुर्गाका जप – ॐ श्री दुर्गा देव्यै नमः

शिवजीका जप – ॐ नमः शिवाय

दत्तात्रेय देवताका जप – ॐ श्री गुरुदेव दत्त

नियमित स्तम्भोंसे सम्बन्धित लेख

पृथ्वी मुद्रा

वज्रासन, सुखासन या पद्मासनमें बैठ कर, अनामिका अंगुलीके अग्र भागसे लगाकर रखनेसे पृथ्वी मुद्रा बनती है । इस मुद्राको करते समय हाथकी शेष अंगुलियोंको सीधी रखें ! वैसे तो पृथ्वी मुद्राको किसी भी आसनमें किया…..

आयुर्वेद अपनाएं स्वस्थ रहें (भाग – २७.८)

गर्भवती महिलाओंको अधिक करेला खानेसे बचना चाहिए; क्योंकि यह समयसे पूर्व ही शिशु-जन्मका कारक बन सकता है । करेलेके रसमें ‘मोमोकैरिन’ नामक तत्त्व होता है, जो मासिकके….

अपने वास्तुको बनाए आश्रम समान चैतन्यमय (भाग- १)

साधको, अपने घरको आश्रम समान चैतन्यमय बनानेका प्रयास करें, आनेवाले आपातकालमें तभी आपका वास्तु अस्तित्त्वमें रहेगा और आपका रक्षण भी करेगा, साथ ही साधना हेतु…….

आर्थिक संकटको दूर करनेके कुछ उपाय (भाग-५)

स्वयं या पूर्वजोंद्वारा अधर्मसे अर्जित धन भी आर्थिक संकटका कारण बनता है । आजकल अनेक लोग येन-केन प्रकारेण धनका संचय करते हैं । उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करनेसे वे अपनी भावी पीढीके लिए सुख-शान्तिकी व्यवस्था कर रहे हैं; किन्तु ऐसा है नहीं…..

अपने बच्चोंको सुखी देखना चाहते हैं तो अपने धनको शुद्ध रखें !

मैंने अपने शोधमें पाया है कि भ्रष्ट लोगोंके बच्चे बहुत धन होनेपर भी सुखी नहीं होते हैं और अधर्मके कारण उनके धन अशुद्ध हो जाते हैं और उससे उनके बच्चोंके संस्कार खराब हो जाते हैं या उन्हें भिन्न प्रकारके कष्ट हो जाते हैं….

स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियाको आरम्भ कैसे करें ? (भाग – २)

इस प्रक्रियाको करने हेतु प्रतिदिन अपनी चूकें (गलतियां) एक अभ्यासपुस्तिकामें लिखें, जो इस प्रक्रियाका प्रथम चरण है, तो आइए इससे क्या लाभ होता है ?, यह जान लेते हैं……

बाहर खानेवाले भोजनके आचार सम्बन्धी नियमोंका पालन कैसे करें ?

अन्नका हमारे मनपर निश्चित ही प्रभाव पडता है । कहावत भी है ‘जैसा खाए अन्न वैसा रहे मन !’ यदि हम बाहरका अन्न खाते हैं तो निम्नलिखित बातोंका पालन कर सकते हैं……..

साधना क्यों करें ? (भाग – १)

‘सुखस्य मूल: धर्म:’  अर्थात धर्मपालनसे मनुष्यका जीवन सुखी होता है और धर्म ही अध्यात्म सिखाता है और अध्यात्मशास्त्रके माध्यमसे साधना करना सम्भव होता है; अतः सुखी जीवन व्यतीत करने हेतु….

पञ्च महायज्ञ कैसे करें ?

स्वाध्याय तथा पूजासे  ऋषियोंका सत्कार, शास्त्र अनुसार यज्ञ कर देवताओंकी पूजा, श्राद्धसे पितरोंकी पूजा, अन्न देकर अतिथियोंकी  और बलिकर्मसे सम्पूर्ण भूतोंकी पूजा (संतुष्टि) करनी चाहिए….

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