धर्मका महत्त्व

अविज्ञाय नरो धर्मं दुःखमायाति याति च ।
मनुष्य जन्म साफल्यं केवलं धर्मसाधनम् ॥
अर्थ : धर्मको न जानकर मनुष्य दुःखी होता है । धर्मका आचरण करनेसे ही मनुष्य जन्म यशस्वी होता है ।

 

 

प्रिय पाठकों, 'वैदिक उपासना पीठ'द्वारा समाजको धर्मशिक्षण देने हेतु  दैनिक ऑडियो सत्संग (अंग्रेजी तथा हिन्दीमें) व्हाट्सएपके माध्यमसे आरम्भ किया गया है । यदि आप अभीतक इस गुटकी सदस्यतासे वंचित हैं तो इस गुटसे जुडने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 0091 9717492523 या 0091 9999670915 के व्हाट्सएप (WhatsApp) पर आप अपना नाम और कहां रहते हैं, यह लिखकर ‘मुझे जागृत भव गुटमें जोडें’ यह सन्देश भेजें और अन्य जिज्ञासुओंको भी इस गुटसे जुडने हेतु प्रेरित कर, धर्म सीखें और सीखाएं  । इस सत्संगके माध्यमसे आप  धर्म एवं अध्यात्मके सैद्धान्तिक एवं प्रायोगिक पक्षोंको घर बैठे सुनकर, समझकर, साधना कर सकते हैं एवं अन्योंको ऐसा करने हेतु प्रेरित कर सकते हैं ।
 'वैदिक उपासना पीठ ' के आश्रम , गौशाला ,प्राकृतिक चिकित्सालय व ध्यान मंदिर निर्माण के पवित्र कार्य में , तन ,मन ,धन ,बुद्धि और कौशल्य   द्वारा सहभागी होकर समष्टि सेवा का लाभ लें|
a1 b1   इस पवित्र कार्य में धन द्वारा अपर्ण हेतु बैंक खाता संख्या की जानकारी के लिए कृपया यहाँ जाएं - अपर्ण सूचना
कृपया हमारे ‘फेसबुक पेज’ (वैदिक उपासना फेसबुक पेज) को ‘लाइक’ करें ! इस ‘पेज’के माध्यमसे प्रतिदिन धर्म और अध्यात्मके विभिन्न पक्षोंको संक्षिप्त और सरल रीतिसे सिखाया जाता है, जिससे साधकों एवं जिज्ञासुओंको वैदिक सनातन धर्मके उन धर्म सिद्धान्तोंके ज्ञान सागरको समझनेमें सहायता प्राप्त होती है, जिन्हें वैदिक सनातन धर्मने अर्वाचीन कालसे संरक्षित किया हुआ है |

आध्यात्मिक उपाय एवं मार्गदर्शन केंद्र पंजीयन

ऑनलाइन पत्रिका प्राप्त करें

आजका पंचांग

शंका समाधान

सहभागी हों

SHOP @VEDIC

यूट्यूब चैनल

सर्व पंथ एवं सम्प्रदाय ऐसे तथाकथित आधुनिक वैद्यों समान हैं, जिन्हें एक ही औषधि ज्ञात हो । वे केवल एक ही प्रकारकी साधना बताते हैं । इसके विपरीत धर्म, जितने व्यक्ति उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग इस तत्त्वानुसार साधना बताता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

उपासना कार्य

सात्त्विक जप

मां दुर्गाका जप – ॐ श्री दुर्गा देव्यै नमः

शिवजीका जप – ॐ नमः शिवाय

दत्तात्रेय देवताका जप – ॐ श्री गुरुदेव दत्त

नियमित स्तम्भोंसे सम्बन्धित लेख

पृथ्वी मुद्रा

वज्रासन, सुखासन या पद्मासनमें बैठ कर, अनामिका अंगुलीके अग्र भागसे लगाकर रखनेसे पृथ्वी मुद्रा बनती है । इस मुद्राको करते समय हाथकी शेष अंगुलियोंको सीधी रखें ! वैसे तो पृथ्वी मुद्राको किसी भी आसनमें किया…..

आयुर्वेद अपनाएं स्वस्थ रहें (भाग – २७.८)

गर्भवती महिलाओंको अधिक करेला खानेसे बचना चाहिए; क्योंकि यह समयसे पूर्व ही शिशु-जन्मका कारक बन सकता है । करेलेके रसमें ‘मोमोकैरिन’ नामक तत्त्व होता है, जो मासिकके….

आपातकालमें देवताको ऐसे करें प्रसन्न ! (भाग-४)

जब हम प्रातः काल अन्नपूर्णा कक्षमें अपनी सेवा आरम्भ करते हैं तो सर्वप्रथम उन्हें प्रार्थना करें, “हे अग्निदेव, मैं आजकी सेवा आपकी कृपासे आरम्भ कर रही हूं, आप इस आपातकालमें भी हमारे लिए यहां इस आधुनिक माध्यम …..

संन्यासीसे बडा कर्मयोगी कोई नहीं होता !

कुछ लोग कहते हैं कि संन्यासी अकर्मण्य या आलसी होते हैं । वस्तुतः ईश्वरप्राप्ति या गुरुकृपा पानेको इच्छुक संन्यासीसे बडा कर्मयोगी कोई नहीं होता । परशुराम जन्मस्थलीके महन्त परम पूज्य बद्री बाबा इसके एक अच्छे उदाहरण ……

विशुद्ध वैदिक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रक्रियामें देव और असुर दोनोंकी जानकारी स्वतः ही प्राप्त हो जाती है !

यदि आप योग्य प्रकारसे साधना करते हैं, तो इष्ट और अनिष्टकी जानकारी साथ-साथ होती है, गुरु या ईश्वर उसकी जानकारी आपको साथ-साथ ही देते हैं । धर्मशिक्षण अन्तर्गत यदि मैं इष्ट ……

प्रेरक कथा – दानका रहस्य

एक गांवमें एक वैश्य रहते थे । वह धर्माचरणी थे तथा सदैव यज्ञादि कर्मोंमें लगे रहते थे । उन्होंने अत्यधिक दान किया । अन्तत: उनका सम्पूर्ण धन समाप्त हो गया तथा उनके लिए भोजन व्यवस्था हेतु भी कुछ शेष न रहा तब सेठ व्यथित हो गए । सेठकी पत्नी धर्माचरणी, ……

घरका वैद्य – कमल पुष्प (भाग-२)

श्वेत कमल केसरके पेस्टमें खाण्ड, शर्करा तथा मधु मिला लें ! इसको चावलके धुले हुए पानीके साथ सेवन करनेसे ‘पेचिश’ ठीक होता है ।
रक्त अर्शमें (खूनी बवासीरमें) : कमलका पुष्प लें, इससे केसर (डंडियां) निकाल लें ! चीनी तथा कमलके ……

स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियाको आरम्भ कैसे करें ? (भाग – २)

इस प्रक्रियाको करने हेतु प्रतिदिन अपनी चूकें (गलतियां) एक अभ्यासपुस्तिकामें लिखें, जो इस प्रक्रियाका प्रथम चरण है, तो आइए इससे क्या लाभ होता है ?, यह जान लेते हैं……

बाहर खानेवाले भोजनके आचार सम्बन्धी नियमोंका पालन कैसे करें ?

अन्नका हमारे मनपर निश्चित ही प्रभाव पडता है । कहावत भी है ‘जैसा खाए अन्न वैसा रहे मन !’ यदि हम बाहरका अन्न खाते हैं तो निम्नलिखित बातोंका पालन कर सकते हैं……..

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution