श्रीगुरु उवाच

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अब सन्तोंका भी हो रहा है अंग्रेजीकरण ! अपने यहां आदर्श जीवनकी लाखों बातें रामायण, महाभारत, पुराण इत्यादिमें होते हुए भी कुछ सन्त उनके नियतकालिकोंमें पाश्चात्योंकी कथाएं प्रेमपूर्वक छापते हैं ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्थासाभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (http://sanatanprabhat.org)

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कालानुसार हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना है अवश्यम्भावी  हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु किसीको कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि कालमहिमाके अनुसार वह होनेवाला ही है; परन्तु इस कार्यमें जो तन-मन-धनका त्याग कर सहभागी होंगे, उनकी साधना होगी तथा वे जन्म-मृत्युके फेरोंसे मुक्त हो जाएंगे । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी […]

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साम्प्रदायिक साधनामें बहुदा भक्तों की प्रगति न होने से उनका साधना सम्बन्धित विश्वास डगमगाता है । ऐसा न हो, इसलिए ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग’  यह सिद्धान्त ध्यानमें रखकर सम्प्रदायके प्रमुखोंने उसप्रकार मार्गदर्शन करना चाहिए । इस हेतु उन्हें विविध साधनामार्गोंका अभ्यास करना आवश्यक है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, […]

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राजकीय पक्षके नेता तथा कार्यकर्ताको यदि कोई धन तथा पदका लोभ दे तो वे दूसरे पक्षमें जाते हैं  | इसके विपरीत भक्त ईश्वरका पक्ष त्यागकर, ईश्वर चरणोंका स्थान त्यागकर अन्यत्र कहीं नहीं जाता | – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (http://sanatanprabhat.org)

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चुनाव विषयक प्रतिदिन आनेवाले समाचार पढकर लगता है, अब चुनाव बालक्रीडा हो गए हैं । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  साभार : https://sanatanprabhat.org/

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साधक चुनावमें जीतें तो उनमें स्वार्थ न होनेसे वे राजनेताओं समान भ्रष्टाचार कभी नहीं करेंगे । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  साभार : https://sanatanprabhat.org/

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विचारस्वातंत्र्य अर्थात दूसरेको व्यथित कर अथवा धर्मविरुद्ध बोलनेका स्वातंत्र्य नहीं है, इतना भी स्वतंत्रता पश्चात ७१ वर्ष भारतपर शासन करनेवाले एक भी राजकीय पक्षके ध्यानमें नहीं आया । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  साभार : https://sanatanprabhat.org/

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वैद्यकीय पदवीधारक न होनेनेपर रोगियोंपर उपचारकी अनुमति नहीं दी जाती । उसीप्रकार राष्ट्र तथा धर्म विषयी जिनमें प्रेम नहीं तथा उस सम्बन्धमें जो कुछ करते नहीं, ऐसे शासनकर्ता चुनकर देनेका अधिकार जनताको देनेसे क्या होता है ? यह भारतकी आजकी दुःस्थितिसे ज्ञात होता है । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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राजकीय पक्षके कार्यकर्ताओंको स्वार्थ हेतु उनके पक्षकी सरकार आवश्यक होती है तो साधकको, सबका कल्याण हो, इस हेतुसे ईश्वरी (धर्म) राज्य हो, ऐसा चाहिए होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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तत्त्वशून्य राजकीय पक्ष जनताको प्रसन्नकर, चुनकर आनेके लिए कुछ भी करते हैं वहीं साधक मात्र ईश्वरको प्रसन्न करनेके लिए कठोर प्रयत्न करनेको सिद्ध रहते हैं ।  –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  साभार : https://sanatanprabhat.org/

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