संस्कार, संस्कृति एवं भाषा

नृत्यके वास्तविक स्वरूपका हो रहा हैं लोप !


आजकल दूरदर्शनकी भिन्न प्रसार वाहिनियोंपर नृत्यके कुछ प्रतिस्पर्धात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं; उसमें आधुनिकीकरण एवं ‘फ्यूजन’के नामपर भारतीय नृत्य शैलियोंका भी लोप हो रहा है । अधिकांश किए गए नृत्य तमोगुणी ही होते हैं । नृत्य भी एक उपासनाका अर्थात ईश्वर प्राप्तिका माध्यम है; किन्तु योग्य साधना न करनेके कारण नृत्यके वास्तविक स्वरूपका भी […]

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धर्मशिक्षणके अभावके कारण हिन्दुओंमें अपनी संस्कृतिके प्रति निर्मित हो गई है हीनभावना


कुछ दिवस पूर्व एक युवा संस्कार वर्गका आयोजन किया गया था, वहांपर भोजन करते समय कुछ बच्चोंको आश्रममें भी चम्मचसे प्रसाद (दोपहरका भोजन) करते देख, मैंने उन सबको हाथसे प्रसाद ग्रहण करनेके लिए कहा; क्योंकि आश्रमका भोजन तो स्वर्ग लोकमें भी नहीं मिलता, तो एक बालिकाने, जिसकी मां भी वहीं बैठी भोजन कर रही थीं, […]

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लक्ष्मणजीकी जितेन्द्रियता


जब सीता माताके आभूषणका अभिज्ञान करनेका निर्देश भगवान श्रीरामने लक्ष्मणजीको दिया तो लक्ष्मणजीने अपनी जितेन्द्रियन्ताका परिचय देते हुए कहा कि मैं मात्र उनके नूपुरका अभिज्ञान ही कर सकता हूं; क्योंकि मेरी दृष्टि मात्र उनके चरणोंपर रहती थी । ऐसी है हमारी दैवी संस्कृति, जिसे पाश्चात्यों और धर्मान्धोंने सांस्कृतिक आक्रमणकर, इस देशसे नष्टप्राय कर दिया है […]

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संस्कृतनिष्ठ हिन्दी सम्बन्धी कुछ ध्यानमें रखने योग्य तथ्य (भाग-१)


हिन्दी भाषाको संस्कृतनिष्ठ बनाने हेतु तमोगुणी उर्दू व अंग्रेजी भाषाका उपयोग करना टालें ! संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भाषाको, हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके पश्चात, सर्वत्र प्रयोगमें लाया जाएगा; अतः संस्कृतनिष्ठ हिन्दी सीखें ! आपको पुनः स्मरण कराने हेतु इसके महत्त्वपूर्ण तथ्योंका पुनः प्रकाशन किया जा रहा है । वर्तमान कालमें प्रायः हम हिन्दी बोलते अथवा लिखते समय सहज […]

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भोजन करनेसे पूर्व की जानेवाली प्रार्थना !


हे प्रभु, आपकी कृपाके कारण ही मुझे आपका यह महाप्रसादरूपी आहार मिला है, इस हेतु हम आपके कृतज्ञ हैं । इस महाप्रसादसे मेरी देहका पोषण हो एवं इसे ग्रहण करते समय मैं नामजप करते हुए कृतज्ञताके भावसे इसे ग्रहण कर सकूं, ऐसा मुझसे प्रयास होने दें ! इस महाप्रसादके चैतन्यसे मुझमें भक्ति, भाव, शरणागति एवं […]

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जैविक खेती (Organic farming) (भाग-३)


जैविक खेतीके उद्देश्य १. मृदा (मिट्टी) संरक्षणके उपायसे उसके स्वास्थ्यको बनाए रखना २. पर्याप्त मात्रामें उच्च गुणवत्तावाला खाद्यान्न उत्पन्न करना ३. मिट्टीकी दीर्घकालीन उर्वरताको बनाए रखना एवं उसे बढाना ४. जैविक उर्वरकोंके उपयोगसे खेतीमें सूक्ष्म जीव, मृदा पादप और अन्य जीवोंके जैविक चक्रको प्रोत्साहित करना तथा बढाना ५. रसायनिक उर्वरकों और रसायनिक औषधियोंके उपयोगको रोकना […]

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जैविक खेती (Organic farming) (भाग-२)


भारत कृषि प्रधान देश है, यहां अधिकांश जनसंख्या गांवोंमें निवास करती है और ६० से ६५ प्रतिशतसे अधिक लोगोंकी जीविकोपार्जनका माध्यम खेती ही है । दिन-प्रतिदिन जनसंख्या वृद्धिके साथ-साथ खाद्यानोंकी मांग भी बढ रही है, अधिकाधिक उत्पादनकी होडमें रसायनिक उर्वरकों, फसलमें होनेवाले रोगके निवारण हेतु कीटनाशकोंका कृषिमें उपयोग बढता जा रहा है । अज्ञानतावश इस […]

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जैविक खेती (Organic farming) (भाग-१)


आनेवाले आपातकालको ध्यानमें रखकर हम यह नूतन लेखमाला आरम्भ कर रहे हैं । इसे पढकर आप भी अपने घरकी ‘बालकनी’, छतपर कुण्डीमें (गमलेमें) या अन्य उपलब्ध संसाधनोंमें या आंगनमें या आपके पास भूमि हो तो उसमें भी सीखकर जैविक खेती आरम्भ कर सकते हैं, यही इस लेखमालाको प्रकाशित करनेका हमारा एकमात्र उद्देश्य है । सम्पूर्ण […]

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उत्तम सन्तति हेतु गर्भाधान संस्कारका महत्त्व (भाग – ४)


श्रेष्ठ सन्तानकी उत्पत्तिके लिए हमारे मनीषियोंने अपने तपोबलसे प्राप्त ज्ञानद्वारा कुछ धार्मिक कर्म स्थापित किए हैं, जिन्हें हिन्दू धर्मग्रन्थोंमें देखा भी जा सकता है । इन्हीं नियमोंका पालन करते हुए विधिनुसार सन्तानोत्पत्तिके लिए आवश्यक कर्म करना ही गर्भाधान संस्कार कहलाता है । जैसे ही पुरुष व स्त्रीका समागम सफल होता है, जीवकी निष्पत्ति होती है […]

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उत्तम सन्तति हेतु गर्भाधान संस्कारका महत्त्व (भाग – ३)


गर्भस्थापनके पश्चात अनेक प्रकारके प्राकृतिक दोषोंके एवं आनिष्ट शक्तियोंके आक्रमण होते हैं, जिनसे बचनेके लिए यह संस्कार किया जाता है । जिससे गर्भ सुरक्षित रहता है । माता-पिताद्वारा खाये अन्न एवं विचारोंका भी गर्भस्थ शिशुपर प्रभाव पडता है । माता-पिताके रज-वीर्यके दोषपूर्ण होनेका कारण उनका धर्मनिष्ठ न होना, मादक द्र्व्योंका सेवन तथा अशुद्ध खानपान होता […]

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