शास्त्र वचन

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वाग्दण्डं  प्रथमं  कुर्यात्  धिग्दण्डं तदनन्तरम् । तृतीयं   धनदण्डं   तु   वधदण्डमतः   परम् ॥ अर्थ : राजाको पहले वाग्दण्ड करना, उसके पश्चात धिक्-दण्ड,  तत्पश्चात धन-दण्ड और अन्तमें ‘वध-दण्ड’ देना चाहिए ।

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अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः । कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम् ॥ अर्थ : जो राजा अप्रमत्त, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ और धार्मिक है, वह लम्बे कार्यकालतक राज्य करता है ।

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असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमय । अर्थ : हे परमात्मन् ! मुझे असत्यसे सत्यकी ओर ले चलिए, मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले चलिए, मुझे अपूर्णतासे (जीवात्मदशासे ) पूर्णताकी (शिवत्वकी) ओर ले चलिए ।

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अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते ॥ अर्थ : उद्वेगको जन्म न देनेवाले, यथार्थ, प्रिय और हितकारक वचन (बोलना), (शास्त्रोंका) स्वाध्याय और अभ्यास करना, यह वाङ्मयीन तप है ।

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पुत्र इव पितु र्गेहे विषये यस्य मानवाः। निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः॥ अर्थ : पुत्र जैसे पिताके घरपर निर्भय होता है, वैसे ही जिस राज्यके लोग निर्भय होकर विचरते (घूमते) हैं, वह राजा श्रेष्ठ राजा होता है ।

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अन्नाद भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद भवति पर्जन्यो  यज्ञः  कर्मसमुद्भवः ।। अर्थ : सारे प्राणी अन्नपर आश्रित हैं, जो वर्षासे उत्पन्न होता है । वर्षा यज्ञ सम्पन्न करनेसे होती है और यज्ञ नियत कर्मोंसे उत्पन्न होता है । ऐसे प्रसादयुक्त अन्नसे जीवमें अशुद्धियां नहीं आती हैं ।

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सदानुरक्तप्रकृतिः       प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हिनृपतिः भूयसीं श्रियमश्नुते॥ अर्थ : प्रजापर सदैव प्रेम रखनेवाला, प्रजापालनमें तत्पर,  विनीत राजा बहुत लक्ष्मी प्राप्त करता है ।

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सदानुरक्तप्रकृतिः  प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हिनृपतिः भूयसीं श्रियमश्नुते॥ अर्थ : प्रजापर सदैव प्रेम रखनेवाला, प्रजापालनमें तत्पर,  विनीत राजा बहुत लक्ष्मी प्राप्त करता है ।

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सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते । समानोव  आकूति:  समाना  हृदयानिव: समानमस्तु  वो  मनो  यथा व: सुसहासति ।। अर्थ : हे मनुष्यो,  तुम सब मिलकर चलो,  मिलकर वार्तालाप करो,  तुम्हारे मन मिल जाए । तुम वैसे ही मिलकर कार्योंको सिद्ध करो जैसे विभिन्न क्षेत्रोंके देव परस्पर सहयोगसे […]

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यथा  मधु समादत्ते रक्षन्  पुष्पाणि  षट्पदः। तद्वदर्थान् मनुष्येभ्यः आदद्यात् अविहिंसया॥ अर्थ : जैसे भौंरा पुष्पोंका रक्षणकर उनमेंसे मधु लेता है, वैसे ही राजाने अहिंसासे प्रजाके पाससे धन (कर) लेना चाहिए ।

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