शास्त्र वचन

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सहृदयं साम्मनस्यमविद्वेषं कृणोमि व: । अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या । अर्थ : हे मनुष्यो ! तुम्हें मैं, सौहार्द, सामंजस्य तथा अविद्वेषका उपदेश करता हूं । तुम एक-दूसरेको वैसे ही प्रेम करो, जैसे नवजात वत्ससे गौ प्रेम करती है ।

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यथा देशस्तथा भाषा यथा राजा तथा प्रजाः। यथा भूमिस्तथा तोयं यथा बीजं तथाङ्कुरः॥ अर्थ : जैसा देश वैसी बोली, जैसा राजा वैसी प्रजा, जैसी भूमि वैसा पानी एवं जैसा बीज वैसा अंकुर होता है ।

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नश्चतस्र प्रदिशो भवन्तु । शं न: पर्वता: ध्रुवयो भवन्तु । शं न सिन्धव: शमु सन्त्वाप: । अर्थ : यह विस्तीर्ण प्रकाशका गोला सूर्य, हम मानवोंके लिए शान्ति लाता हुआ उदित हो, चारों दिशाएं हमारे लिए शान्तिको विकीर्ण करें ! ये अचल पर्वत हमें शान्तिका सन्देश सुनाएं ! ये समुद्र और नदियां भी हमें शान्तिका पाठ […]

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मूर्खे नियोज्यमाने तु त्रयो दोषाः महीपतेः। अयशश्र्चार्थनाशश्र्च नरके गमनं तथा॥ अर्थ : मूर्ख मानवकी नियुक्ति करनेवाले राजाको तीन दोष लगते हैं, यथा अपयश, द्रव्यनाश और नरकप्राप्ति ।

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मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया । सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः ।।  अर्थ : जो राजा मोहसे, अविचारसे अपने राज्यको दुर्बल करता है, वह राज्यसे और बन्धुसहित जीनेसे पूर्व ही शीघ्र नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ।

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अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः । स्वावलम्बः दृढाभ्यासः षडेते छात्र सद्गुणाः ॥ अर्थ : अनालस्य, ब्रह्मचर्य, शील, गुरुजनके लिए आदर, स्वावलम्बन और दृढ अभ्यास, ये छह छात्रके सद्गुण हैं ।

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एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिगमन क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभि रणम्॥  भावार्थ : तप अकेलेमें करना उचित होता है, पढनेमें दो, गानेमें तीन, जाते समय चार, खेतमें पांच व्यक्ति तथा युद्धमें अनेक व्यक्ति होना चाहिए ।

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ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या या निवृतिः ॥  भावार्थ : पुत्र वही है, जो पिताका भक्त है । पिता वही है, जो पोषक है, मित्र वही है,  जो विश्वासपात्र हो । पत्नी वही है,  जो हृदयको आनन्दित करे ।

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अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोंपसेविन:  । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विध्या यशोबलं  ।। अर्थ : वयोवृद्धका अभिवादन करनेवाले मनुष्यकी और नित्य वृद्धोंकी सेवा करनेवाले मनुष्यकी आयु, विद्या यश और बल, ये चारों बढते हैं ।

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ऋषभांष्चापि जानामि राजनपूजितलक्षणान्  ।  येषां मूत्रामुपाघ्राय अपि बन्ध्या प्रसूयते ।। – महाभारत, विराटपर्व अर्थ: उत्तम लक्षणवाले उन बैलोंका भी मुझे अभिज्ञान (पहचान) है, जिनके मूत्रको सूंघ लेने मात्रसे बंध्या स्त्री गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है ।

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