शास्त्र वचन


धर्मादुत्कृष्यते श्रेयस्तथश्रेयोsप्यधर्मतः ।

रागवान् प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान् भवेत् ॥

अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – धर्म करनेसे श्रेयकी वृद्धि होती है और अधर्म करनेसे मनुष्यका अकल्याण होता है । विषयासक्त पुरुष प्रकृतिको प्राप्त होता है और विरक्त आत्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है ।

अज्ञानतृप्तो विषयेष्ववगाढोनतृप्यते ।

अदृष्टवच्च भूतात्मा विषयेभ्यो निवर्तते ॥

अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – जिसको अज्ञानसे ही तृप्तिप्राप्त हो रही है, वह मनुष्य विषयोंके अगाध जलमें सदा डूबा रहकर भी कभी तृप्त नहीं होता । वह जीवात्मा प्रारब्धाधीन हुआ विषय – भोगोंकी इच्छाके कारण बारम्बार इस संसारमें आता और जन्म ग्रहण करता है



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