अध्यात्म एवं साधना

अहं निर्मूलन (भाग-६)


ईर्ष्यालु व्यक्तिका अहं अधिक होता है । अर्थात यदि आपमें भी यह अवगुण है तो आपका भी अहं अधिक है यह समझ लें और सतर्क होकर इस घातक अहंके लक्षणको दूर करें ! यह अवगुण घातक इसलिए होता है; क्योंकि इसके प्रबल होनेपर मनुष्यकी बुद्धि भ्रष्ट होकर उससे अपराध भी हो सकते हैं । हमारे धर्मग्रन्थोंमें ……

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अहं निर्मूलन (भाग-५)


अपनी चूक स्वीकार न करना
जिन कार्यकर्ताओंमें या साधकोंमें अहं अधिक होता है, उनकी वृत्ति बहिर्मुख होती है । वृत्तिके अन्तर्मुखी नहीं होनेपर उनमें स्वयंके दोष या अहंका उन्हें भान ही नहीं होता है । यदि कभी उनसे चूक हो भी जाए तो वे यह जानते हुए भी चूक ……

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अहं निर्मूलन (भाग – ४)


अहंके लक्षण – मनानुसार आचरण करना
हमारे श्रीगुरुने हमें गुरुकृपा अनुसार साधना सिखाई और हमने उसी पद्धतिसे साधना करनेका प्रयास किया । उनकी आज्ञा अनुसार हम धर्मप्रसार करते थे और आज भी करते हैं । धर्मप्रसारके मध्य मैंने पाया कि वर्तमान कालमें सामान्य लोगोंमें मनमाना …..

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अहं निर्मूलन (भाग-३)


अहंके लक्षण : मनानुसार आचरण करना 
इस लक्षणको आपने इस कोरोना महामारीमें कालमें सम्पूर्ण भारतमें देखा होगा । अहंकारी व्यक्तिका यह प्रमुख दुर्गुण होता है कि वह किसीकी बात नहीं मानता, यहांतक प्राण संकटमें हो सकते हैं, यह जाननेपर भी वह प्रशासनद्वारा लगाए ……

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अहम् निर्मूलन (भाग-२)


अहम् निर्मूलनकी प्रक्रिया भी दोषनिर्मूलनकी प्रक्रियाके समान ही होती है । जैसे दोषनिर्मूलन हेतु हमें अपनी चूकें एवं उसके उत्तरदायी दोषको लिखकर उसे दूर करने हेतु स्वयंसूचना देना होती है, वैसे ही अहंके भी कुछ लक्ष्ण होते हैं । उन लक्षणोंके अनुरूप जब भी हमसे अयोग्य वर्तन होता है, उसे अपनी अहम् निर्मूलन …..

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अहंनिर्मूलन (भाग-१)


हमने आपको दोषनिर्मूलन क्यों करना है ?, कैसे करना है ?, इसके विषयमें बताया ही है, आज साधनाके अभावमें समाजमें अहंका भी प्रमाण बहुत अधिक है ! अहंके कारण आज भारतमें शिक्षित वर्गमें सम्बन्ध विच्छेदका प्रमाण बहुत अधिक बढ गया है । कलह-क्लेशके पीछे भी ……

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बोझ या कार्य समझकर सेवा करनेवालोंसे ईश्वर अधिक समय सेवा नहीं कराते हैं


साधको, सत्सेवा मिले तो सौभाग्य व कृतज्ञताके भावसे, यह सेवा ‘परिपूर्ण सेवा हो’, इस भावसे करनेका प्रयास करें, इसे बोझ न समझें ! बोझ या कार्य समझकर करनेवालोंसे ईश्वर अधिक समय सेवा नहीं कराते हैं । – (पू.) तनुजा ठाकुर

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आश्रममें अन्नपूर्णा कक्षको मांका मन्दिर मानकर सेवा करनी चाहिए !


वर्तमान कालमें सामान्य व्यक्तिपर रज-तमका आवरण इतना अधिक हो गया है कि सत्सेवा अर्थात ईश्वरप्राप्तिका माध्यम है; इसलिए उसे ‘सत्यम शिवम् और सुन्दरम’के सिद्धान्त अनुसार करना चाहिए, यह साधकोंको बार-बार सिखानेके ……

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शंका समाधान – वर्तमान कालमें नेत्र खोलकर नामजप करें या नेत्र बंदकर !

मैं पिछले कुछ वर्षोंसे आपके बताए अनुसार प्रतिदिन बैठकर नामजप करनेका प्रयास करता हूं | विगत कुछ दिवसोंसे जब भी मैं नेत्र खोल कर नामजप करता हूं तो मेरा ध्यान भटक जाता है एवं आंखें बंद कर करता हूं तब नामजप अच्छेसे होता है; परन्तु नींदका झोंका लग जाता है; साथ ही मुझे यह भान होता है कि मुझसे नींदमें भी नामजप हो रहा है । ऐसेमें मैंने क्या करना चाहिए, कृपया मार्गदशन करें ? - एक साधक, देहली


वर्तमान कालमें सर्वत्र रज-तमका प्रकोप अत्यधिक बढ गया है; इसलिए सबको नामजप नेत्र खोलकर करने हेतु कहा गया है ! यह सत्य है कि जिसका अध्यात्मिक स्तर ५० % से अधिक होता है, उन्हें नेत्र बंदकर नामजप करनेमें बहुत अधिक आनंद  …..

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चूक होनेपर कौनसा प्रयाश्चित लें ?


उपासनाके कुछ साधकोंसे जब व्यष्टि या समष्टि स्तरकी बडी चूकें होती हैं और इसकारण उन्हें प्रायश्चित लेने हेतु कहा जाता है तो वे पूछते हैं कि हम कौनसा प्रयाश्चित लें ? तो आज आपको प्रायश्चितके विषयमें बताते हैं । सर्वप्रथम यह जान लेते हैं कि प्रायश्चित क्यों लेना चाहिए ? ईश्वरद्वारा रचित इस विश्वमें कर्मफल […]

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