कलियुगी साधकोंकी वस्तुस्थिति


यदि कोई युवती अपने प्रेमीसे विवाहकर घर बसाती है और कुछ दिवस पश्चात उसे ज्ञात होता है कि विवाह उपरान्त जिस जीवनका वह स्वप्न देखती थी वह तो अत्यन्त मधुर था और यह यथार्थ अत्यन्त कटु है; क्योंकि उसे घरके कार्य करने होते हैं, ससुरालके सभी सगे-सम्बन्धियोंका ध्यान रखना होता है, किसीकी झिडकी और किसीकी कटु बातें सुननी होती हैं, तो वह अपने प्रेमी रूपी पतिसे कहती है कि अब मैं आपका साथ छोड रही हूं; क्योंकि मुझे लगा था कि विवाहकर हम प्रतिदिन घूमने जाएंगे, बाहर खाएंगे, चलचित्र देखने जाएंगे; किन्तु आपसे विवाहकर तो मेरा जीवन उत्तरदायित्त्वोंके बोझसे घिर गया; अतः मैं आपको छोडकर जा रही हूं, तो ऐसेमें उसका प्रेम कितना गहन होगा ? यह सबको समझमें आ गया होगा ।

आजके अनेक साधकोंकी, जिन्हें ‘कलियुगी साधक’ कहना अधिक उचित होगा, उनकी भी स्थिति ऐसी ही है, सबको गुरुकृपा चाहिए, आध्यात्मिक प्रगतिकी भी अपेक्षा है, आनन्द भी चाहिए, कष्ट भी स्वयंके नहीं, सम्पूर्ण कुलके न्यून होने चाहिए; किन्तु साधनामें तन, मन, बुद्धि और अहंको तनिक भी घिसना नहीं चाहते और यदि ऐसा करवाया गया तो साधना छोडनेका विकल्प उन्हें आने लगता है, ऐसे साधकोंका प्रेम ऊपरकी जो प्रेमिका है, उसके जैसा ही है ।
व्यावहारिक प्रेमको निभाने हेतु भी अत्यधिक कष्ट झेलने पडते हैं, यह किसी प्रेमी जोडेसे पूछें, जिन्होंने कुछ वर्ष वैवाहिक बन्धनमें निकाला है और आध्यात्मिक प्रेम निभाने हेतु तो पराकाष्ठाकी दृढता और मन, बुद्धि तथा अहंके मन्थनको सहन करनेकी शक्ति चाहिए । अध्यात्ममें प्रतिदिन मन, बुद्धि और अहंको घिसना होता है; किन्तु कलियुगी साधककी अपेक्षा होती है कि उनके गुरु उनकी प्रशंसा करते रहें; किन्तु उससे उनके अहंका पोषण होगा, यह सरलसा सिद्धान्त समझमें नहीं आता है ।



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