अध्यात्म एवं साधना

साधना हेतु पुरुषार्थ ही योग्य पुरुषार्थ होता है !


कुछ लोगोंको लगता है कि उन्होंने जो धन कमाए हैं वह उनके पुरुषार्थके कारण है ! धनका योग प्रारब्धके अनुसार सहज प्राप्त होता है ! यदि वह क्रियामाणसे प्राप्त होता तो एक ही माता-पिताद्वारा संस्कारित या सुशिक्षित सन्तानें जो एक समान क्रियामाणसे प्रयास करते हैं, वे एक समान धनी होते; किन्तु ऐसा होता नहीं है, […]

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आश्रम व्यवस्था (भाग – ३)


आश्रमव्यवस्थाका जहां शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहीं उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है । भारतीय मनीषियोंने मानव जीवनको केवल प्रवाह न मानकर……

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मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – १२)


मांसाहारसे मांसकी वृद्धिको वैज्ञानिकोंने कर्करोग जैसी व्याधियोंमें ट्यूमरकी वृद्धिके साथ सम्बंधित होनेके प्रमाण पाए हैं I वैज्ञानिकोंके मध्य आहार एवं कर्करोगके मध्यके संबंधको….

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प्रार्थना – भावजागृतिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग – १८)


हे प्रभु, अभी मैं पूजा करने जा रहा हूं, पूजा पूर्व आप हमारे पूजा-घर, हमारे वास्तु एवं हमारे चारों ओर अभेद्य सुरक्षा कवच निर्माण करें, जिससे मेरी पूजा निर्विघ्न एवं एकाग्रतापूर्वक हो सके । मेरी आजकी पूजा एवं आरती आपके….

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आश्रम व्यवस्था (भाग – २)


आश्रम जीवनका मुख्य उद्देश्य होता है साधना कर ईश्वरप्राप्ति करना ! हमारे मनीषियोंने जीवनकी चार अवस्थाओंको आश्रम बताकर यह सन्देश दिया कि जीवनके प्रत्येक….

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मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – ११)


यह तो सर्वविदित ही है कि हत्यासे पहले पशु, पक्षी, मछलियों आदिके स्वास्थ्यकी पूरी जांच नहीं की जाती है और उनके शरीरमें छुपे हुए रोगोंका पता नहीं लगाया जाता । अण्डे, पशु, पक्षी, मछलियां भी कैंसर, ट्यूमर आदि अनेक रोगोंसे ग्रस्त होते हैं और उनके मांसके सेवनसे वे रोग मनुष्यमें प्रवेश कर जाते हैं । […]

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प्रार्थना – भावजागृतिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग – १७)


भोजन करनेसे पूर्व की जानेवाली प्रार्थना हे प्रभु, आपकी कृपाके कारण ही मुझे आपका यह महाप्रसादरूपी आहार मिला है, इस हेतु हम आपके कृतज्ञ हैं । इस महाप्रसादसे मेरे देहका पोषण हो एवं इसे ग्रहण करते समय मैं नामजप करते हुए कृतज्ञताके भावसे इसे ग्रहण कर सकूं, ऐसा मुझसे प्रयास होने दें ! इस महाप्रसादके […]

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आश्रम व्यवस्था (भाग – १)


गृहस्थ-आश्रम (उत्तम गुणोंके आचरण और श्रेष्ठ पदार्थोंकी उन्नतिसे सन्तानों की उत्पत्ति और वानप्रस्थ आश्रम हेतु प्रवृत्त होनेके लिए सुखका उपभोग करते हुए साधनाके संस्कारको….

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स्वभावदोष निर्मूलन क्यों करना चाहिए ?


साधकोंने स्वभावदोष निर्मूलन क्यों करना चाहिए ?, इस सम्बन्धमें एक शास्त्र वचन इस प्रकार है – ‘बहूनपि गुणानेक दोषो ग्रसति’  अर्थात एक दोष बहुतसे गुणोंको भी नष्ट कर देता है । साधनाका संचय हो एवं गुण उभरकर आये, इस हेतु स्वभावदोष निर्मूलन अति आवश्यक है ! इसे एक उदाहरणसे समझ लेते हैं, एक व्यक्ति अपने […]

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स्तरानुसार साधनासे लोगोंके दृष्टिकोण समझ आते हैं !


कुछ दिवस पूर्व एक व्यक्तिसे मेरी बातचीत हो रही थी ! वे ४० वर्षोंसे गायत्री साधना करते हैं और बाह्य रूपसे साधक होनेका पूर्ण दिखावा करते हैं । वे मुझसे कहने लगे इतने सारे दुर्जनों….

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