साधनाके अवरोधक (भाग-१०)


साधनाके लिए प्रतिकूल या अनावश्यक साहित्योंका अभ्यास करना 
शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हेतु साधकोंको साधना हेतु पोषक साहित्यका अभ्यास अवश्य ही करना चाहिए । अब साधकके लिए कौनसे साहित्यका अभ्यास करना आवश्यक है ?, इसके लिए या तो वे जो उनसे साधनासे आगे हैं, उनसे पूछें या अध्यात्मशास्त्रका मूलभूत तत्त्वज्ञान जिन ग्रन्थोंमें हो, पहले उनका अभ्यास करना चाहिए । साथ ही सन्तों एवं उच्च कोटिके भक्तोंके चरित्रका भी अभ्यास साधना हेतु पोषक होता है । अभ्यास करते समय जो शंका उत्पन्न हो, उसका निराकरण भी अपने गुरु, मार्गदर्शक या ज्येष्ठ साधकोंसे कराना चाहिए । अभ्यास करते समय प्राथमिक अवस्थाके साधकको एक गुरुके लिखे हुए या एक ही योगमार्गके ग्रन्थोंका अभ्यास करना चाहिए अन्यथा साधना प्रगल्भ न हो तो सम्भ्रम होनेकी आशंका होती है ।
 साथ ही साधकके लिए समय बहुत ही बहुमूल्य होता है; अतः जो साहित्य, साधना हेतु आवश्यक न हो, ऐसे साहित्यके अभ्यासमें समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए । वैसे तो मैंने पाया है कि वर्तमान कालमें साधकोंको आध्यात्मिक साहित्यको पढनेमें अधिक रुचि नहीं होती है । कुछ साधक तो ग्रन्थ क्रय कर लेते हैं; किन्तु उसे पढते नहीं, मात्र अपने घरकी कपाटिकामें सजा कर रख देते हैं ।
मैं अपने अनुभवके आधारपर कह सकती हूं कि साधनामें यदि ज्ञान व भावका संगम हो तो साधक द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगतिकर उच्च आध्यात्मिक स्तरको साध्य कर सकता है; क्योंकि साधकके जीवनमें ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं जब वह द्वन्द्वमें फंस जाता है, ऐसी स्थितिमें उसका यदि अध्यात्मशास्त्रका अभ्यास हो तो उसके मनमें अपने गुरु या आराध्यके प्रति विकल्प निर्माण नहीं होता है, वह विषम परिस्थितिमें तत्त्वज्ञानके सिद्धान्त अनुसार आचरणकर ऐसी परिस्थितिसे सहज ही निकल सकता है । मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ है, मेरे जीवनमें ज्ञान ही मेरा गुरु रहा है, जब भी मेरे मनमें कोई द्वन्द्व होता है, तब जिन ग्रन्थोंका अभ्यास मैंने किया है, उनका तत्त्वज्ञान ही मेरा मार्गदर्शन करता है; इसलिए मेरा आग्रह है कि साधकोंको प्रत्येक दिवस थोडा समय साधनाके लिए अनुकूल साहित्यके अभ्यास हेतु देना चाहिए; किन्तु यदि अभ्याससे आप शब्दजालमें फंसकर भ्रमित होते हैं तो आपको अपनी व्यष्टि साधनापर अधिक ध्यान देना चाहिए ।
  साधकोंको किस प्रकारके ग्रन्थोंके अध्ययन हेतु प्राथमिकता देना चाहिए ?, यह बताना भी अति आवश्यक है । आरम्भमें साधनाके मूलभूत सिद्धान्त, साधकोंकी अनुभूतियां, सन्त चरित्र, गुरुके तत्त्वज्ञान या योगमार्गकी विशेषताएं, साधक या शिष्यके गुण, दोष व अहं निर्मूलन जैसे ग्रन्थोंको प्राथमिकता देनी चाहिए ।


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