साधनाके अवरोधक (भाग-४)


कुतर्क
वर्तमान कालमें यह दुर्गुण अनेक साधकोंमें देखनेको मिलता है । तर्क और कुतर्कमें अन्तर होता है । जिसकी बुद्धि तीक्ष्ण हो, जिसने शास्त्रोंका अभ्यासकर साधना की होती है, वे ही तर्क करनेके अधिकारी होते हैं ।  साम्प्रत कालमें वृत्तिसे तमोगुणी एवं अहंकारी व्यक्ति  बिना ज्ञानके कुतर्क करनेमें सबसे आगे रहता है । यही उसके लिए सबसे बडा अवरोधक सिद्ध होता है । इससे उन्हें किसी भी सन्तकी कृपा नहीं मिलती है । उसे अपने ज्ञानका बहुत अधिक अहंकार होता है । उसे इस बातका भी भान नहीं होता है कि इससे उसकी ही हानि हो रही है एवं इससे उसे कोई भी ज्ञान नहीं देगा एवं यहांतक कि उन्हें ईश्वर भी कुछ नहीं सिखानेवाले हैं; अतः साधकोंको सिखानेकी नहीं; अपितु सीखनेकी वृत्ति आत्मसात करनी चाहिए एवं कुतर्कसे बचना चाहिए, इससे शक्तिका भी क्षय नहीं होता है, जिसका सदुपयोग साधना हेतु किया जा सकता है ।


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