अध्यात्म एवं साधना

आश्रम व्यवस्था (भाग – २)


आश्रम जीवनका मुख्य उद्देश्य होता है साधना कर ईश्वरप्राप्ति करना ! हमारे मनीषियोंने जीवनकी चार अवस्थाओंको आश्रम बताकर यह सन्देश दिया कि जीवनके प्रत्येक….

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मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – ११)


यह तो सर्वविदित ही हैं कि हत्यासे पहले पशु, पक्षी, मछलियों आदिके स्वास्थ्यकी पूरी जांच नहीं की जाती है और उनके शरीरमें छुपे हुए रोगोंका पता नहीं लगाया जाता । अण्डे, पशु, पक्षी मछलियां भी कैंसर ट्यूमर आदि अनेक रोगोंसे ग्रस्त होते हैं और उनके मांसके सेवनसे वे रोग मनुष्यमें प्रवेश कर जाते हैं । […]

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प्रार्थना – भावजागृतिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग – १७)


भोजन करनेसे पूर्व की जानेवाली प्रार्थना हे प्रभु, आपकी कृपाके कारण ही मुझे, आपका यह महाप्रसाद रूपी आहार मिला है, इस हेतु हम आपके कृतज्ञ हैं । इस महाप्रसादसे मेरे देहका पोषण हो एवं इसे ग्रहण करते समय मैं नामजप करते हुए कृतज्ञताके भावसे इसे ग्रहण कर सकूं, ऐसा मुझसे प्रयास होने दें ! इस […]

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आश्रम व्यवस्था (भाग – १)


गृहस्थ-आश्रम (उत्तम गुणोंके आचरण और श्रेष्ठ पदार्थोंकी उन्नतिसे सन्तानों की उत्पत्ति और वानप्रस्थ आश्रम हेतु प्रवृत्त होनेके लिए सुखका उपभोग करते हुए साधनाके संस्कारको….

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स्वाभावदोष निर्मूलन क्यों करना चाहिए ?


साधकोंने स्वाभावदोष निर्मूलन क्यों करना चाहिए ?, इस सम्बन्धमें एक शास्त्र वचन इस प्रकार है – ‘बहूनपि गुणानेक दोषो ग्रसति’ अर्थात एक दोष बहुतसे गुणोंको भी नष्ट कर देता है । साधनाका संचय हो एवं गुण उभर कर आए, इस हेतु स्वाभावदोष निर्मूलन अति आवश्यक है ! इसे एक उदहारणसे समझ लेते हैं एक व्यक्ति […]

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स्तरानुसार साधनासे लोगोंके दृष्टिकोण समझ आते हैं !


कुछ दिवस पूर्व एक व्यक्तिसे मेरी बातचीत हो रही थी ! वे ४० वर्षोंसे गायत्री साधना करते हैं और बाह्य रूपसे साधक होनेका पूर्ण दिखावा करते हैं । वे मुझसे कहने लगे इतने सारे दुर्जनों….

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मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – १०)


जब पशु पशुवधगृह (बूचडखानेमें) कसाईके द्वारा अपनी मृत्युको पास आते देखता है तो वह भय और आतंकसे कांप उठता है । मृत्युको समीप भांपकर वह एक-दो दिन पहलेसे ही खाना पीना छोड देता है….

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वैदिक उपासना पीठका आश्रमनिर्माण ईश्वरका कार्य !


वैदिक उपासनाके निर्माणाधीन आश्रमके सम्बन्धमें एक व्यक्तिसे मेरी चर्चा हो रही थी तो उन्होंने कहा कि आपको आश्रमके निर्माण कार्यके लिए धन चाहिए तो आप अपनी ब्रांडिंग कराएं….

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ईश्वरको सरल हृदय ही प्रिय होते हैं


ईश्वरको भोले एवं सरल हृदयवाले व्यक्ति प्रिय होते हैं । हम जितने नम्र और शरणागत रहते हैं, उतना ही अधिक उनका ध्यान हमपर रहता है । वैसे ही जैसे निर्बल चूजोंके (शावकोंके) प्रति चिडियाका अधिक ध्यान रहता है । जब चूजे स्वयं सिद्ध होकर अपना भोजन ढूंढने लगते हैं और उडने लगते हैं, तब चिडिया […]

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‘महाभारत घरमें न रखें’, यह एक भ्रान्ति है !


जो धर्मपरायण पुरुष श्रद्धाके साथ सर्वदा सावधान रहकर प्रतिदिन इस अध्यायका सेवन करता है वह पाप-तापसे मुक्त हो जाता है ।अर्थात मात्र प्रथम अध्यायका जो पाठ कर लेता है….

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