साधक अहं निर्मूलन क्यों करें ? (भाग-१)


अपनी आध्यात्मिक यात्राके मध्य मैंने अहंके कारण साधकोंको कष्ट होते या अटकते हुए देखा है । कुछ साधकोंको बार-बार बतानेपर भी वे अपने अहंको कम करनेका प्रयास नहीं करते हैं; इसलिए सोचा कि अपने अनुभूत किए हुए कुछ तथ्योंको साझा करती हूं । हो सकता है इससे उन्हें ज्ञात हो कि अहं निर्मूलन करना क्यों आवश्यक होता है ?
सितम्बर २०१० मैं झारखंडके एक गांवमें रहकर सत्संग लिया करती थी । एक दिवस एक युवा साधककी देहमें एक अनिष्ट शक्ति प्रकट हो गई ।
वह उसी गांवके एक प्रभावशाली व्यक्तिकी लिंगदेह थी । उसने प्रकट होते ही, क्या-क्या इस गांवके लिए किया था ? उसका बखान करने लगा । उसने उस साधकके माध्यमसे बताया कि उसने गांवमें विद्यालय खुलवाए, मन्दिरके लिए दान दिया और न जाने क्या-क्या किया ! मैंने उनसे पूछा कि आप यहां क्यों आए हैं ? तो उसने कहा कि उसे गति नहीं मिली है; इसलिए वह प्रेतयोनिसे अपनी गति हेतु आई है ।
इस प्रसंगसे हमने यह सीखा कि समाजसेवकमें अहं अधिक होनेके कारण वे अटक जाते हैं; किन्तु ऐसी स्थितिमें भी वे अपनी स्तुति करते नहीं थकते हैं ।
भावनावश सेवाका यह परिणाम हमारे मनीषी जानते थे; इसलिए उन्होंने हमें सेवा करते समय कर्तापन अर्पण करने हेतु कहा है । अर्थात अहंसे, इस लोकमें ही नहीं; अपितु परलोकमें भी कष्ट होता है; इसलिए अहं निर्मूलन हेतु सातत्यसे प्रयास करना चाहिए ।



One response to “साधक अहं निर्मूलन क्यों करें ? (भाग-१)”

  1. Sw amrit says:

    अत्यंत शुभ

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