साधनाके अवरोधक (भाग-६)


अपवित्रता
  मैकाले शिक्षण पद्धतिमें यदि किसी संस्कारका सर्वाधिक लोप हुआ है तो वह है पवित्रताका ! आज हिन्दुओंको ‘पवित्रता’ शब्दका अर्थ ही ज्ञात नहीं है । आजके धर्मभ्रष्ट हिन्दुओंसे तो विदेशी हिन्दू अच्छे हैं, जो जैसे ही हिन्दू धर्म अनुसार साधना करने लगते हैं, वे पवित्रता शब्दको महत्त्व देने लगते हैं । मेरा जन्म एवं पालन-पोषण एक कर्मकाण्डी मैथिली ब्राह्मण परिवारमें हुआ और जब मैं आजके जन्म-हिन्दुओंको देखती हूं तो ईश्वर, गुरु और अपने माता-पिताको बहुत कृतज्ञता व्यक्त करती हूं कि उन्होंने मुझमें ये संस्कार कूट-कूटकर भरे ! मुझे सबसे अधिक कठिनाई धर्मप्रसारके मध्य हुई, जब मुझे अपवित्र रूपसे रह रहे हिन्दुओंके घरपर रहना पडता था, मेरे लिए वह विषम स्थिति ही मेरी साधना थी । वस्तुतः सूक्ष्म जगतकी जानकारी प्राप्त करनेमें एवं उसमें कार्य करने हेतु सबसे आवश्यक गुण पवित्रता ही है । मेरा ऐसा मानना है कि तनकी पवित्रता हेतु जो भी हिन्दू धर्ममें बताया गया है, उसे करनेसे मनके विचार पवित्र होने लगते हैं । एक उदाहरण देती हूं । मेरे पिताजी हमें कभी भी बाहर खाने नहीं देते थे । उनका कहना था कि पता नहीं भोज्य पदार्थ बनानेवाले व्यक्तिने कितनी शुचिताका ध्यान रखकर उसे बनाया होगा । यदि किसी कुसंस्कारी व्यक्तिने अपवित्रतासे भोज्य पदार्थ बनाया होगा तो हमारे विचार दूषित हो जाएंगे, यह उन्होंने बाल्यकालसे इतनी बार बताया कि आज भी मेरी किसी भोजनालयमें या बाहरके बने पदार्थ ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं होती है एवं मात्र विषम परिस्थितियोंमें ही कुछ खाया है ! अब तो अन्तर्जालके (इन्टरनेटके) कारण ज्ञात होने ही लगा है कि कैसे कुछ लोग भोज्य पदार्थको जूठा कर देते हैं ?, तो कुछ लोग उसमें हानिकारक पदार्थ मिलाते हैं, कहीं भोजनको चूहा खा रहा होता है तो कहीं बहुत ही अस्वच्छ वातावरणमें उसे बनाया जाता है । इन सबसे शारीरिक हानि तो होती ही है, सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि इससे संस्कार नष्ट हो जाते हैं !; इसलिए बाहरका भोजन या अपवित्र व्यक्तिके हाथका भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए । यह तो मात्र पवित्रताके एक संस्कारकी बात बताई है । हिन्दू धर्ममें पवित्र रहने हेतु ऐसे ही अनेक तथ्य बताए गए हैं, जिनका आज हिन्दू पालन नहीं करते हैं । जैसे मल और मूत्र त्यागके पश्चात अपनी जननेन्द्रियों, हाथ-पांवको धोकर आचमन करना, यह हमारे देहकी शुद्धि हेतु अति आवश्यक होता है, यह भी आज अनेक हिन्दू नहीं करते हैं । वैसे ही एक ‘बित्ते’के घरमें कुत्ते और बिल्ली पालते हैं, उसी हाथसे भोजन बनाते हैं, उनके साथ खाते और सोते हैं । कुत्ते-बिल्लीका मल-मूत्र बडे प्रेमसे उठाते हैं और गायके गोमूत्र व गोबरसे उन्हें दुर्गन्ध आती है ! घरमें जूठन इत्यादिका भी पालन नहीं करते हैं, दोनों हाथोंसे खाते हैं; उसके पश्चात उन्हीं हाथोंसे पात्रमें रखे हुए भोजनको निकालते हैं और पुनः उस जूठे भोजनको प्रशीतकमें (फ्रिजमें) रख देते हैं !
घरमें बाहरके पादत्राण (चप्पल) पहनकर घूमते हैं । वर्तमान समयमें ५०% स्त्रियां बाएं हाथसे भोजन बनाती, खाती और परोसती हैं, जो पुनः अपवित्रताका सूचक है । घरमें और बाहर विदेशी वस्त्र पहनते हैं । वह भी वेशभूषा है, तब भी कुछ सिद्ध एवं शुचिताका पालन करनेवाले मन्दिरोंमें ऐसे लोगोंको घुसने नहीं दिया जाता है । तिलक लगानेमें लज्जाका अनुभव करते हैं और बिना तिलकके माथा अपवित्र होता है । अपने निकटके परिजनके दाह-संस्कारमें सम्मिलित होनेपर भी केशका मुण्डन नहीं कराते हैं और उसी अपवित्र देहसे पूजा-पाठ करते हैं और कहते हैं कि पूजा फलित नहीं होती है । पुरुष शिखा व जनेऊ रखनेमें लज्जाका अनुभव करते हैं और विवाहित स्त्रियां सर्व सौभाग्य अलंकारको त्यागकर विधवा समान रहनेमें गर्व अनुभव करती हैं ।
१३ दिवसके मृत्यु सूतकको आर्य समाजियोंके चक्करमें ४ दिनका सूतक मानकर, उस अपवित्र कालमें सब शुभ कर्म करते हैं ! पाठको ! सूची बहुत लम्बी है । संक्षेपमें यह जान लें कि धर्मशिक्षणके अभावमें एवं आधुनिकीकरणके रंगमें रंगनेके कारण आजके अधिकांश हिन्दू धर्मभ्रष्ट हो गए हैं ! इसके कारण आज ७०% हिन्दुओंकी देह, अहिन्दुओंकी लिङ्गदेहसे आवेशित है ।
इस सम्बन्धमें आपको मैं दो अनुभव बताती हूं । जनवरी २०११ में मैं बेंगलुरुके अपने अनुजके घर गई थी । वहीं एक व्यक्ति मिला, जो मेरे बडे भ्राताका मित्र था । उन्होंने आग्रहकर अपने घर बुलाया । उनके घर जानेपर ज्ञात हुआ कि उन्हें भोजन पचता ही नहीं है । उन्हें देखते ही ज्ञात हुआ कि उन्हें अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट है । मैंने उनपर आध्यात्मिक उपचार हेतु अञ्जुलीमें जल लेकर जैसे ही छिडका, उनके भीतरसे एक अनिष्ट शक्ति प्रकट हो गई और कहने लगी कि मैं इसे मारकर रहूंगी ! जब पूछा कि वह कौन है ?, तो उसने बताया कि वह एक अहिन्दू है और उसके किसी मित्रकी अन्त्येष्टिमें जाते समय श्मशान घाटमें ही उसकी देहमें प्रवेश कर गया था ।
मैंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया ? इनका दोष क्या है ? तो उसने कहा, “ब्राह्मण-ब्राह्मण बोलता है, जनेऊ क्यों नहीं पहनता है, हमारे लिए बिना जनेऊधारी पुरुषमें प्रवेश करना बहुत ही सरल होता है ।” उनकी मां एक महाविद्यालयमें प्रधानाचार्या थीं । महानगरोंमें पली-बडी थीं, उन्हें यह सुनकर जैसे बडा धक्का लगा ।
  एक दूसरा प्रसंग बताती हूं ! एक गांवमें मेरा थोडे समय रहना हुआ था । उस गांवमें सभीके घर तीव्र अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, ऐसा लगता था । कुछ दिवस पश्चात जब वहां सत्संग होने लगा तो बच्चोंमें भूत प्रकट होकर कहने लगे कि उनके घरके पुरुष ‘ईद’में निकटके मुसलमानी टोलेमें अपने मित्रोंके घर जाकर मांसाहर करते हैं और वे लोग इन्हें बकरेके मांसमें गोमांस मिलाकर खिलाते हैं ! इस बातके साक्षी उस गांवके ३०-४० लोग हैं, जो सत्संगमें आते थे । जब हमने इसकी सत्यता जांचनेका प्रयास किया तो ज्ञात हुआ कि सचमें उस गांवके हिन्दू पुरुष, मुसलमानोंके घर जाकर मांसाहार करते थे । आज अन्तर्जालपर (इन्टरनेटपर) जो बात ज्ञात हो रही है, वह सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंने २०१० में बच्चोंके माध्यमसे बता दी थी; इसीलिए पूर्वकालमें कोई भी हिन्दू किसी अहिन्दूसे ‘रोटी-बेटी’का कभी भी सम्बन्ध नहीं रखता था; किन्तु इस धर्मनिरपेक्षताके कुसंस्कारने वैदिक हिन्दुओंके सर्व संस्कारोंका सत्यानाश कर दिया है ।
 लोग मुझसे पूछते हैं कि आपकी सूक्ष्म इन्द्रियां कैसे जाग्रत हुईं ? मेरे श्रीगुरुसे साक्षात्कारसे पूर्व ही मेरी सूक्ष्म इन्द्रियां जाग्रत थीं और उसका मुख्य कारण मेरी पूर्व जन्मकी साधना तो थी ही; किन्तु मेरे घरके संस्कारोंने मेरे मन एवं बुद्धिपर कभी आवरण नहीं आने दिया और मैंने अपने संस्कारोंके साथ कभी निरवत्ति (समझौता) भी नहीं की ! वैदिक सनातन धर्म, सूक्ष्म ज्ञान आधारित है और इसे पाने हेतु या साधना करने हेतु, पवित्रता रूपी गुणको आत्मसात करना सबसे अधिक आवश्यक है । ईश्वर आज्ञा अनुरूप मैं धर्मप्रसार हेतु विदेश गई; किन्तु वहां भी मैं शुचिताका सतर्क होकर ध्यान रखा करती थी, यद्यपि वहां इसे करना थोडा कठिन है; इसलिए विदेश जाना मुझे प्रिय नहीं है और वहां जानेपर मैं मात्र धर्मप्रसार हेतु ही कहीं जाती थी । एक साधकको एक सतर्क योद्धा समान अपने संस्कारोंका रक्षण करना पडता है, तभी वह साधनाके उत्तरोतर चरणोंको साध्य करता है । हिन्दू राष्ट्रमें शुचिताके ये संस्कार बाल्यकालसे ही पाठ्यक्रमके भाग होंगे !


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