साधनाके अवरोधक (भाग-५)


अधैर्य 
 सहनशीलताको धृति या धैर्य कहा जाता है । यह एक सद्गुण है और अधैर्य एक दुर्गुण है एवं साधनामें यह एक मुख्य अवरोधक होता है । विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो जानेपर भी मनमें चिन्ता, शोक और उदासी उत्पन्न होनेपर मन उद्विग्न हो जाता है और धैर्यके अभावमें अनेक बार साधक अध्यात्मके पथसे दूर हो जाते हैं ।
सन्त कबीरने कहा है :
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । 
माली सींचे सौ घडा ॠतु आए फल होय ।।  
अर्थात प्रकृतिमें भी सब कुछ समय अनुसार ही होता है, जैसे माली चाहे कितना ही पानी डाल दे, फल निर्धारित ऋतुमें ही आता है, वैसे ही साधकको भी धैर्य धारण करना चाहिए । आज साधना आरम्भ की तो कल उसका फल दिखाई देने लगेगा, ऐसा नहीं होता । साधना फलित होनेके लिए भी अनेक उत्तरदायी घटक होते हैं । जब सब सिद्ध होने लगते हैं तो साधनाका परिणाम दिखाई देने लगता है ।  इसमें किसीको कुछ माह, किसी को कुछ वर्ष तो किसीको कुछ जन्म भी लग सकते हैं; किन्तु इसका प्रभाव अवश्य ही दिखाई देता है ।  जैसे किसी व्यक्तिका प्रारब्ध तीव्र हो तो उसके प्रतिदिन, नियमित साधना करनेपर भी उसे कुछ माह या कुछ वर्ष सुखद परिणाम दिखाई नहीं दे सकता है; क्योंकि प्रारब्धकी तीव्रताको समाप्त करनेमें साधना व्यय होती है, फलस्वरूप आध्यात्मिक प्रगति उतनी द्रुत गतिसे नहीं होती है ! उसी प्रकार किसीका आध्यात्मिक स्तर कम हो तो उसे जीवनमुक्त होनेमें समय लगेगा; किन्तु यदि किसीका आध्यात्मिक स्तर अधिक हो एवं वह सातत्यसे एवं भावसे साधना करता हो तो वह शीघ्र जीवनमुक्त हो सकता है ! इसलिए दूसरेसे तुलनाकर स्वयंमें हीन भावना नहीं आने देनी चाहिए एवं श्रद्धा व धैर्यके साथ साधना हेतु योग्य प्रयास करते रहना चाहिए । वस्तुतः अनेक बार गुरु या ईश्वर साधकके धैर्यकी परीक्षा लेते हैं । एक बार वह इसमें उत्तीर्ण हो जाए तो उसे वह दे देते हैं, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होती है ।
      धैर्यवान साधक विपत्ति आनेपर भी अपने आराध्यपर अपनी श्रद्धा बनाए रखता है एवं अपना मानसिक सन्तुलन बनाए रखता है । वह शान्तचित्त होकर इसपर नियन्त्रण करते हुए दुःखसे बचनेका सरल मार्ग ढूंढ लेता है । सुख-दुःख, जय-पराजय, हानि लाभ, ‘गर्मी-सर्दी’ आदि अनेक ऐसे द्वन्द्व हैं, जो सांसारिक जीवनमें अनुकूलता या प्रतिकूलताका अनुभव कराते रहते हैं । द्वन्द्वोंपर विजय पानेके लिए किया गया पुरुषार्थ एक प्रकारका तप है । इन द्वन्द्वोंपर विजय पानेके पश्चात साधक एक धीर पुरुष बन जाता है । इस गुणके कारण वह सुखके समय प्रसन्नतासे गदगद नहीं होता और न दु:खमें हतोत्साहित होकर साधनाका त्याग करता है; अपितु प्रत्येक अवस्थामें समान रूपसे क्रियाशील रहते हुए साधनामें सातत्य बनाए रखता है । धैर्यके गुणको प्राप्त करके मनुष्यमें असाधारण साम‌र्थ्य आ जाता है एवं अनेक वर्षोंतक जब वह किसी भी विषम परिस्थितिमें बिना घबराए अपने साधना मार्गपर अडिग रहता है तो वह समद्रष्टा बन जाता है, जो अध्यात्ममें एक बडी उपलब्धि होती है ।


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