साधनाके अवरोधक (भाग-३)


आलस्य
    आलसी व्यक्ति कभी भी अधिक समयतक साधना नहीं कर सकता है । साधना मात्र और मात्र कर्मठ व्यक्ति ही कर सकता है । साधना किसी भी योगमार्गसे की जाए, वह तप ही होता है और तप एवं आलस्य ये दो विरोधाभासी तत्त्व हैं; इसलिए जिन्हें मोक्ष चाहिए, उन्हें आलस्यका त्याग करना होगा । किसी भी व्यक्तिको अध्यात्ममें ही नहीं, व्यवहारमें भी सफलताके शिखरको छूने हेतु आलस्यरूपी दुर्गुणको दूर करना पडता है ।
 सभीके पास २४ घण्टे ही होते हैं, असफल व्यक्ति उन चौबीस घण्टोंका सदुपयोग नहीं करता है । उसके लिए शरीरका सुख बहुत अधिक महत्त्व रखता है । वह शरीरको कष्ट देनेवाले कार्यसे दूर भागता है और साधनाका मार्ग कठिनतम है । इसमें कोई अवकाश नहीं होता, ईश्वरप्राप्ति होनेतक साधकको सतत तत्परताके साथ कर्मरत रहना पडता है । हमने देखा है कि कुछ लोग कहते हैं कि संन्यासीका जीवन बहुत ही सरल है, भजन करो और खाओ; किन्तु ऐसा है नहीं ! एक खरे संन्यासीका जीवन बहुत ही कठोर होता है, वह स्थूलसे पहले ही सर्वस्व अर्पण कर देता है, उसके पश्चात जो बच जाता है, वह है स्थूल देह और समय; इसलिए वह इन दोनोंका सदुपयोगकर ईश्वरको प्रसन्न करनेका प्रयास करता है ।
 मैंने देखा है कि आजकल अनेक लोग जो शारीरिक रूपसे अस्वस्थ होते हैं तो उनकी अस्वस्थताके कारणोंमेंसे एक मूल कारण आलस्य है । पूर्वकालमें आजके समान सुख देनेवाले आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे; अतः दैनिक जीवनके कार्यके सम्पादन हेतु भी लोगोंको अधिक श्रम करना पडता था, इससे वे स्वस्थ रहते थे और उनमें आलस्य भी नहीं होता था ।
हिन्दू धर्मकी जीवनशैली ऐसी है कि उसके नित्य पालनसे स्वतः ही आलस्य दूर भाग जाएगा । गृहस्थोंके लिए हिन्दू धर्ममें वर्षके दो तिहाई भागमें कोई न कोई व्रत-त्योहार एवं धार्मिक अनुष्ठान होते ही हैं । यहांतक कि कार्तिक, माघ इत्यादि माहमें भारतके अधिकांश भागमें शरद ऋतु होती है और उसी समय ब्रह्म मुहूर्तमें स्नानका धार्मिक विधान है । ऐसे कर्म करनेसे तो स्वतः ही आलस्य भाग जाएगा । हिन्दू धर्ममें जितने भी व्रत-त्योहार हैं, उनमें भी अनेक प्रकार अनुष्ठान होते हैं, पकवान बनाकर नैवेद्य लगाए जाते हैं । पूर्व कालके गृहस्थ प्रतिदिन पञ्च महायज्ञ करते थे । इससे ज्ञात होता है कि हिन्दू धर्म आलस्यको त्यागकर कर्म करनेका सन्देश देता है ।
     साधना करने हेतु सात्त्विक जीवन प्रणाली अपनानी चाहिए, सात्त्विक आहार लेना चाहिए; इस सबके लिए भी आलस्यका त्याग करना अति आवश्यक है । उदाहरणके लिए ‘सलवार-कुर्ती’ पहनना सरल होता है; किन्तु छह या नौ गजकी साडी पहनना और उसके रखरखाव करनेमें थोडा तो अधिक श्रम करना पडता है; किन्तु यदि हमें दैवी लाभ चाहिए तो सात्त्विक वस्त्र पहनने हेतु कष्ट उठाना चाहिए । भोजनके साथ भी यह सिद्धान्त लागू होता है । यदि हमें सात्त्विक आहार चाहिए तो वह बासी नहीं होना चाहिए अर्थात उसे भी तीनों समय बनाकर त्वरित खाना चाहिए । आपको पूर्वके लेखमें बताया ही था कि आयुर्वेद कहता है कि भोजन बनानेके ४५ मिनिट पश्चात ही उसे ग्रहण करना चाहिए, तभी उसके सभी पोषक तत्त्वोंको हम ग्रहण कर सकते हैं । पुनः ऐसा करना आलसी लोगोंके लिए सम्भव नहीं है ।


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