मृत्युके पश्चात मनुष्यके साथ यह जाता है :-
१. कामना – यदि मृत्यके समय हमारे मनमें किसी वस्तु विशेषके प्रति कोई आसक्ति शेष रह जाती है, कोई इच्छा अधूरी रह जाती है, कोई अपूर्ण कामना रह जाती है, तो मरणोपरान्त वही कामना उस जीवात्माके सङ्ग जाती है ।
२. वासना – वासना, कामनाकी ही साथी है । वासनाका अर्थ मात्र शारीरिक भोगसे नहीं; अपितु इस संसारमें भोगे हुए प्रत्येक उस सुखसे है, जो उस जीवात्माको प्रसन्नता प्रदान करता है । चाहे वह घर हो, पैसा, गाडी, प्रतिष्ठा हो अथवा शौर्य । मृत्युके पश्चात भी ये अधूरी वासनाएं मनुष्यके सङ्ग ही जाती हैं तथा मोक्ष प्राप्तिमें बाधक होती हैं ।
३. कर्म – मृत्युके पश्चात हमारेद्वारा किए गए कर्म, चाहे वे सुकर्म हों अथवा कुकर्म, हमारे सङ्ग ही जाते हैं । मरणोपरान्त, जीवात्मा अपनेद्वारा किए गए कर्मोंकी पूंजी भी सङ्ग ले जाता है, जिसके लेखा-जोखाद्वारा उस जीवात्माका, अर्थात हमारा, अगला जन्म निर्धारित किया जाता है ।
४. ऋण – यदि मनुष्यने, अर्थात हमने-आपने, जीवनमें कभी भी किसी भी प्रकारका ऋण लिया है, तो उस ऋणको यथासम्भव उतार देना चाहिए । जिससे मरणोपरान्त, इस लोकसे उस लोकमें उस ऋणको अपने सङ्गन ले जाना पडे ।
५. पुण्य – हमारेद्वारा किए गए दान-दक्षिणा व परमार्थके कार्य ही हमारे पुण्योंकी पूंजी होती है; इसलिए हमें समय-समयपर अपने सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा एवं परमार्थ तथा परोपकार आवश्य ही करने चाहिए ।
६. साधना – मनुष्य मृत्युसे पूर्व जितनी भी साधना करता है, वह साथ जाती है; इसलिए साधना अवश्य करनी चाहिए ।
इन छह तथ्योंके आधारपर ही मनुष्यको इस मृत्युलोकको छोडकर, परलोक जानेपर, उस लोक अथवा अगले जन्मकी प्रक्रियाका चयन किया जाता है ।
(लेखक – अज्ञात)
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