धर्मधारा : अपनी अनावश्यक बातोंसे या सन्देशसे सभीका समय व्यर्थ करनेवाले इस लेखको कृपया अवश्य पढें !


समयका महत्त्व न जाननेवाले अनेक बहिर्मुख प्रवृतिके व्यक्ति पहले तो ‘जाग्रत भव’के ‘व्हाट्सऐप’ गुटके नियम तोडकर अनावश्यक बातें, छायाचित्र साझा करते हैं एवं जब उनसे ऐसा करनेके लिए मना किया जाता है तो वे निर्लज्ज होकर पूछते कि मेरे एक सन्देश डालनेसे दूसरोंका या सबका समय कैसे व्यर्थ हुआ है ? यह बताएं ! यह प्रसंग अनेक बार घटित हो चुका है; अतः सोचा कि ऐसे सभी बहिर्मुख व्यक्तियोंको इस सम्बन्धमें योग्य दृष्टिकोण मिले, इस हेतु इस उत्तरको सार्वजनिक करना अति आवश्यक है ।

बाल्यकालसे हमारे पिताजी हमें समयका महत्त्व बताते हुए कहते थे कि समय और ज्वारभाटा किसीकी प्रतीक्षा नहीं करते ; अतः समयका एक क्षण भी व्यर्थ नहीं करना चाहिए । ग्रीष्मकालीन या शीतकालीन अवकाशमें वे हमारी दिनचर्या बना देते और जब हम अपनी अवकाश हेतु विद्यालयसे दिए गए सर्व गृहकार्य (होमवर्क) समाप्त कर लेते थे तो वे हमें व्याकरण, या बोधप्रद पुस्तकें पढने हेतु देते थे एवं अनेक बार तो वे हमें शब्दकोष ही स्मरण करने दते थे । पहले तो हम भाई-बहन सोचते थे कि हमें अन्य बच्चों समान अवकाशमें स्वतन्त्र होकर मनमानी नहीं करने दी जाती है; किन्तु बडे होनेपर हमारे भीतर समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए, यह संस्कार दृढ हो गया और आज इस संस्कारके कारण हमें अपने माता-पिताके प्रति बहुत कृतज्ञता व्यक्त होती है । यह न समझें कि वे हमें सदैव पढने हेतु बोलते थे । उन्होंने हमारे खेलनेके लिए समय निश्चित किया था और यदि हम कभी ‘ठण्ड’ या ‘गर्मी’का कारण या आलस्यवश बहार नहीं जाते थे वे हमें उस हेतु भी उत्साहित करते थे । मेरे पिताजी कई बार कहते थे कि जब आप मायामें (संसारमें) घूमेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि आपको आपके माता-पिताने क्या दिया है ? आज वे इस लोकमें नहीं हैं; किन्तु उनके दिए सुसंस्कारोंने निश्चित ही मुझे साधनामें शीघ्र प्रगति करनेमें या समष्टिको दिशा देनेमें सहायता की है ।

जब मैं अपने श्रीगुरुसे मिली तो वे भी समयको अत्यधिक महत्त्व देते थे, मुझे उनकी यह बात बहुत अच्छी लगती थी । एक प्रसंग बताती हूं जिसके माध्यमसे उन्होंने प्रत्येक ‘सेकेण्ड’का महत्त्व क्या है ? यह सिखाया । नवम्बर २००० की बात है मैं गोवामें श्रीगुरुके दर्शन एवं मार्गदशन हेतु उत्तरभारतसे गई थी । तबतक मैं पूर्ण समय साधना करने लगी थी । एक दिवस उनका सत्संग था, जिसमें वे हम सभी साधकोंका मार्गदर्शन कर रहे थे । उस सत्संगमें लगभग डेढ सौ साधक थे । उनके मार्गदर्शनके पश्चात अनुभूति कथनका सत्र होता था । हम कुछ साधक अपनी कोई विशिष्ट अनुभूति उन्हें बताते थे । दो साधकोंने अनुभूति कथन आरम्भ करनेसे पूर्व उन्हें नमस्कार कहा । उन्होंने दूसरे साधकको नमस्कारके पश्चात त्वरित रोकते हुए कहा कि नमस्कार बोलनेकी आवशयकता नहीं है, आपको यह शब्द बोलनेमें यदि पांच ‘सेकण्ड्स’ भी लगते हैं और यदि बीस साधक आज अनुभूति बताते हैं तो बीस पंचे सौ अर्थात एक ‘मिनिट’ चालीस ‘सेकेण्ड’का समय समष्टिका व्यर्थ हो जाएगा । इसी समयमें कोई और अपनी कोई छोटीसी अनुभूति बता सकता है या उस समयका उपयोग किसी और कार्य हेतु कर सकता है । डेढ सौ साधकोंका डेढ मिनिट यदि व्यर्थ होता है तो कुल कितना समय व्यर्थ हो गया, इसका अनुमान लगाएं और साथ ही उन्होंने कहा कि जब एक साधक अनुभूति बता रहे हो, तो अगला साधक जो अनुभूति बतानेवाला है, वह आकर किनारे खडा रहे, जिससे दूसरे साधकका उठकर यहां आनेमें समय व्यर्थ नहीं होगा और समष्टिका समय बचेगा ।

उनका यह दृष्टिकोण सुनकर मैं जैसे धन्य हो गई । मैंने उनकी यह बात गांठ बांध ली और यथासम्भव उसका पालन करनेका प्रयास करती हूं; क्योंकि खरा शिष्य वह होता है, जो स्वयं गुरुके उपदेशका पालन करे एवं दूसरोंसे भी करवाए !

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