अपने युवा होते बच्चोंको साधना हेतु क्यों प्रवृत्त करें ? (भाग-१)


अपने युवा होते बच्चोंको साधना हेतु अवश्य ही प्रवृत्त करें, इससे आपको और उन्हें दोनोंको ही अनेक लाभ होंगे । आपको ये सभी लाभ समझमें आएं और आप अपने युवा बच्चोंको साधना हेतु प्रवृत्त करें; इसीलिए यह लेखमाला आपसे साझा कर रही हूं ।
साधनासे जीवनको मिलती है योग्य दिशा
मैंने धर्मप्रसारके मध्य अनेक घरोंमें देखा है कि युवा अपनी शिक्षा किसी और क्षेत्रमें लेते हैं और अपने उपजीविकोपार्जन हेतु किसी और क्षेत्रमें कार्य करते हैं । कुछ युवक या युवतियां तो अपना क्षेत्र परिवार्तित होनेपर उसके लिए तीन-चार वर्ष उस परिवर्तित क्षेत्रके लिए विशिष्ट पदवी पुनः प्राप्त करनेमें अपने युवाकालके अनमोल समय व्यर्थ करते हैं ।
वर्तमान कालमें माता-पिता भी साधना नहीं करते हैं; अतः वे भी अपने बच्चोंका यथोचित मार्गदर्शन नहीं कर पाते हैं । इतना ही नहीं आज सौ प्रतिशत घरोंमें पितृदोष है और मैंने अपने सूक्ष्म शोधमें पाया है कि अनेक बार अतृप्त पितर अपने युवा और सात्त्विक वंशजोंको जो साधना नहीं करते हैं, उन्हें दिशाभ्रमित करते हैं और वे अपनी वृत्ति अनुकूल क्षेत्रमें शिक्षा ग्रहण नहीं करते हैं या यदि करते हैं तो उसके माध्यमसे उनके (उप)जीविकोपार्जनके साधन उपलब्ध नहीं हो पाते हैं; इसलिए वे कुछ अनमोल वर्ष व्यर्थ हो जानेपर अपना क्षेत्र परिवर्तित कर लेते हैं । ऐसा होनेके पीछे अधिकांशतः जो मूल कारण होता है, वह बुद्धि अगम्य होनेके कारण आध्यात्मिक स्वरूपका होता है । मैं आपको इसके कुछ उदाहरण दूंगी, जिससे आपको यह विषय और अच्छेसे समझमें आए । आज एक उदाहरण देती हूं ।
एक युवक ‘फुटबॉल’ खिलाडी बनना चाहता था; इसलिए उसने अपनी पढाई भी पूरी नहीं की और वह उसमें ही अधिक ध्यान देने लगा; किन्तु तीन-चार वर्ष बहुत प्रयास करनेपर भी उसे जिस उपलब्धिकी अपेक्षा थी, वह नहीं मिली और एक दिवस खेलके मध्य उसके नाक और मुखमें बहुत चोट आ गई, इससे वह और निराश हो गया । वह पुनः एक छोटेसे प्रतिष्ठानमें एक श्रमिककी चाकरी करने लगा । जब मैं उससे मिली, तब उसकी आयु २६ वर्षकी थी और वह अपने जीवनसे बहुत असन्तुष्ट था ।
यह, मैं यूरोपके एक साधकके पुत्रका प्रसंग बता रही हूं । जब मैं उनके घर प्रथम बार गई तो ज्ञात हुआ कि उनके यहां तीव्र स्तरका पितृदोष है । उनके यहां तो आता था; किन्तु फलता नहीं था, सारे पैसे कहां चले जाते ? यह उन्हें समझमें नहीं आता था । अनेक वर्ष विदेशमें रहकर भी उनका अपना घर नहीं था, जिसका उन्हें बहुत दुःख था । उनकी पुत्रीका भी सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका था और उसने दूसरा विवाह किसी विदेशीसे किया था । पत्नीको भी शारीरिक कष्ट थे एवं विशेषकर सभी अपने पुत्रकी दिशाहीनता एवं उसके निराशाजनक वर्तनसे वे सब बहुत दुखी थे ।
मैंने उन सबको साधना करने हेतु कहा और आज सात वर्ष पश्चात साधनाके कारण उनका पुत्र एक सफल और सन्तुष्ट व्यापारी है । उसे जीवनमें क्या करना है ? यह ज्ञात हो गया है, इतना ही नहीं उसके वर्तनमें बहुत परिवर्तन आया है, जिससे सभी बहुत आश्चर्यचकित हैं । यह साधनाका महत्त्व है ।



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