समाजको बाल्यकालसे बुद्धि अगम्य अध्यात्मशास्त्रका शिक्षण देकर साधनाकी ओर प्रवृत्त करना चाहिए ।


तर्कवादी (बुद्धिप्रामाण्यवादी) मात्र आजके कालमें ही नहीं हुए है, ऐसे लोग समाजमें तमस बढनेपर सर्वकालमें होते हैं तभी तो ‘बुद्धिप्रामाण्यवादियों’के विषयमें महाभारतका एक श्लोकमें इनका वर्णन है, जो यह बताता है कि कैसे उनका जगत मात्र जो दिखाई देता है और उनकी सीमित बुद्धिसे समझ आता है, उसतक ही सीमित होता है एवं उस कारण उनकी हानि भी होती है !

आत्मप्रमाण  उन्नद्धः श्रेयसो ह्यवमन्यकः ।

इन्द्रियप्रीतिसम्बद्धं यदिदं लोकसाक्षिकम् ॥

अर्थ : युधिष्ठिर कहते हैं : केवल अपनी बुद्धिको ही प्रमाण माननेवाला उद्दण्ड मानव श्रेष्ठ पुरुषों एवं उत्तम धर्मकी अवहेलना करता है; क्योंकि वह मूढ इन्द्रियोंकी आसक्तिसे सम्बन्ध रखनेवाले इस लोक – प्रत्यक्ष दृश्य जगतकी ही सत्ता स्वीकार करता है । अप्रत्यक्ष वस्तुके विषयमें उसकी बुद्धि मोहमें पड जाती है ।

वर्तमान कालमें निधर्मी शिक्षण पद्धतिके कारण समाजमें ऐसे बुद्धिप्रामाण्यवादियोंकी संख्यामें भारी वृद्धि हुई है जो भारत जैसे आध्यात्मिक देशके घातक है । ऐसे लोग अपनी निकृष्ट सोचके कारण अपनी हानि तो करते ही हैं साथ ही लोगोंको अपने कुत्सित ज्ञानसे दिशाभ्रमित उनके लिए भी अवनतिके मार्ग खोल देते हैं । ऐसे लोगोंके विचारका बौद्धिक खण्डन करना तो चाहिए ही साथ ही समाजको बाल्यकालसे बुद्धि अगम्य अध्यात्मशास्त्रका शिक्षण देकर साधनाकी ओर प्रवृत्त करना चाहिए । साधकको साधनाके पश्चात अनुभूतियां होने लगती हैं और वे सूक्ष्म जगतपर विश्वास करने लगते हैं; इसलिए वे ऐसे संकुचित एवं अहंकारी बुद्धिवादियोंके चक्रव्यूहमें नहीं फंसते हैं ।

मुझे आश्चर्य इस बातका हुआ कि हमारे शास्त्रोंमें ऐसे समाजकंटकोंका उल्लेख है, अर्थात द्वापरयुगमें भी ऐसे लोग थे, यद्यपि उनकी संख्या बहुत अल्प होगी ।



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