संन्यास या पूर्ण समय साधना करनेवाले लोग स्वार्थी नहीं होते (भाग-५)


जो भी साधक जीव संन्यास लेकर किसी भी योगमार्गसे साधना करता हो यदि वह इस जन्ममें अपने परम उद्देश्य अर्थात जीवनमुक्त नहीं भी होता हो तो भी वह अपने प्रारब्धको भोगकर, अपने साधनाके बलपर अपने संचितको अवश्य ही न्यून कर लेता है । इससे उसका अगला जन्म सुधर जाता है अर्थात अगले जन्ममें उसके लिए आध्यात्मिक प्रगति करना सरल हो जाता है और यदि दिशा योग्य हो और संचित व प्रारब्धकी तीव्रता अल्प हो तो वह जीवनमुक्त हो जाता है । इस प्रकार संन्यास एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवके व्यष्टि उद्देश्यके लिए सदैव कल्याणकारी होती है । संन्यासीने संन्यास क्यों लिया है ? यदि इस उद्देश्यपर उसका ध्यान केन्द्रित रहता है तो वह अपने क्रियमाणसे पापकर्म तो कदापि नहीं करता है; क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि पापकर्म उसके कर्मफलको बढा देगा, जो उसके मूल उद्देश्यकी प्राप्तिमें इस जन्ममें या अगले जन्ममें बाधक सिद्ध होगा; अतः एक अन्तर्मुखी संन्यासी कभी पापकर्म नहीं करता है । संन्यासीको ज्ञात होता है कि पुण्यकर्म भी उसकी लक्ष्यप्राप्तिमें बाधक है; क्योंकि शास्त्र अनुसार पाप और पुण्य दोनों ही बेडियां (जंजीर) होती हैं । बुरे कर्मका परिणाम पापात्मक पापके रूपमें मिलता है और पुण्यकर्मका परिणाम पुण्यात्मक पापके रूपमें मिलता है । अर्थात दोनों ही भोगने पडते हैं; अतः दोनों ही पाप समान ही होते हैं; क्योंकि दोनोंको भोगने हेतु स्वर्ग व नरकके साथ ही पृथ्वी लोकपर आना ही पडता है । अतः संन्यासी, कर्म करते समय सचेत रहता है । वह अपने कर्म बन्धनोंसे मुक्त होने हेतु संन्यास लेता है; अतः वह प्रत्येक क्षण अपने कर्मोंके फलको ईश्वर या गुरु चरणोंमें अर्पण करता है । यथार्थमें संन्यास अपने मनसे कभी नहीं लिया जाता है । उसे पात्रता देखकर कोई सन्त देते हैं तो स्वाभाविक है कि वह उनकी शरणमें जानेके पश्चात, सर्व कर्म उनके मार्गदर्शनमें करता है; इसलिए उससे अधर्म नहीं होता और गुरुके मर्गदर्शनमें यदि कोई संन्यासी समाजसेवा भी करता है तो गुरुके संकल्पके कारण वह नूतन पुण्य कर्म निर्माण न कर, उसकेद्वारा की गई सेवाके कारण, प्रारब्धकी तीव्रता व संचित न्यून होकर उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है । अपने मनके अनुसार भावनामें बहकर समाज सेवा करनेवाले अपने लिए पुण्यकर्म निर्माण करता है, जिससे उसे पुनः-पुनः पृथ्वीपर और स्वर्गमें पुण्यके फलको भोगने हेतु जाना पडता है । इसलिए संन्यासी समाजसेवा करके अपना व समष्टि दोनोंका कल्याण करता है तो उसे स्वार्थी कैसे कहा जा सकता है ?



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