शास्त्र वचन


शास्त्रनित्या जितक्रोधा बलवन्तो रणे सदा ।

जन्मशीलगुणोपेताः संधेयाः पुरुषोत्तमाः ॥

अर्थ : युधिष्ठिरद्वारा मित्र किसको बनाना चाहिए, पूछनेपर भीष्म कहते हैं – जो प्रतिदिन शास्त्रोंका स्वाध्याय करते हैं, क्रोधको नियन्त्रणमें रखते हैं और युद्धमें सदा प्रबल रहते हैं । जिनका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है, जो शीलवान और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनानेके योग्य होते हैं ।

यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति ।

यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

अर्थ : राजा ययाति कहते हैं – जब सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि होनेके कारण यह पुरुष किसीसे नहीं डरता, जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते, जब वह न तो किसीकी इच्छा करता है और न किसीसे द्वेष ही रखता है, उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ।

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