शास्त्र वचन


अवमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता ।

कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा  गुणाः ॥

अर्थ: भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी प्रकार भी घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप समझें !

रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यंगनियच्छन्ति ।

तदा प्रकाशतेsस्यात्मा  घटे दीपो ज्वलन्निव ॥

अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे मन, बुद्धिपर चर्चा करते हुए कहते हैं : जब जीव बुद्धिरूपी सारथी और मनरूपी बागडोरद्वारा इन्द्रियरूपी अश्वोंकी लगाम भली प्रकार नियन्त्रणमें रखता है, तब घडेमें रखे हुए प्रज्ज्वलित दीपकके समान अपने भीतर ही उसकी आत्मा प्रकाशित होने लगती है ।



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