शास्त्र वचन


लोहयुक्तं यथा हेम विपक्वं न विराजते ।

तथापक्वकषायाख्यं विज्ञानं न प्रकाशते ॥

अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं – जैसे लोहयुक्त सुवर्ण आगमें पकाकर शुद्ध किए बिना अपने स्वरूपसे प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार चित्तके राग आदि दोषोंका नाश हुए बिना उसमें ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित नहीं होती ।

तथापक्वकषायाख्यं मोहस्तमसा भरतर्षभ ।

क्रोधलोभौ भयं दर्प एतेषां सादनाच्छुचिः ॥

अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं – भरत श्रेष्ठ ! रजोगुण और तमोगुणसे मोहकी उत्पत्ति होती है तथा उससे क्रोध, लोभ, भय एवं दर्प उत्पन्न होते हैं । इन सबका नाश करनेसे ही मनुष्य शुद्ध होता है ।

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