शास्त्र वचन

याचना क्यों न करें ?


देहीति वचनद्वारा देहस्था पञ्च देवता: । तत्क्षणादेव लीयन्ते र्धीह्र्रीश्र्रीकान्र्तिकीर्तय: ॥                                                                  अर्थ : ‘दे’ इस शब्दके साथ, याचना करनेसे देहमें स्थित पांच देवता, बुद्धि, लज्जा, […]

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शास्त्र वचन


              श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः सः पन्थाः ॥ – महाभारत अर्थ – वेद और धर्मशास्त्र अनेक प्रकारके हैं । कोई एक ऐसा मुनि नहीं है जिनका वचन प्रमाण माना जाय । अर्थात श्रुतियों, स्मृतियों और मुनियोंके मत भिन्न-भिन्न हैं । […]

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शास्त्र वचन


विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मति: |  परलोके धनं धर्म: शीलं सर्वत्र वै धनम् || अर्थ : परदेसमें विद्या ही धन होता है | विपत्तिमें विवेक धन होता है और परलोकमें धर्म ही धन होता है और आदर्श वर्तन अर्थात अच्छा चरित्र सर्वकाल एवं सर्वत्र धन समान होता है |

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सत्संग और संत महिमा


सत्संग और संत महिमा * बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥4॥ भावार्थ:-सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण का मूल है। सत्संग की सिद्धि […]

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संतका आनंद


न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम् | यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः || – श्रीगुरु गीता अर्थ :- सारी आसक्तियोंसे मुक्त एकांतिक जीवन जीनेवाले संतका आनंद, देवताओंके राजा इंद्र, सम्राट और शक्तिशाली राज्यकर्ताओंसे भी अधिक होता है |

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इच्छाकी गांठ


अङ्गं गलितं पलितं मुन्डं दशनविहीनं जातं तुन्डम् । वृद्धो यति गृहीत्वा दन्डं तदापि न मुञ्चत्याशापिन्डम् ॥    अर्थ : शरीर झुक गया है, सिरके केश श्वेत हो गया है, मुंहमें दांत नहीं, वृद्ध होनेपर व्यक्ति लाठीके सहारे चलता है; परंतु इच्छाकी गांठको ढीला नहीं कर पाता है |

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सनातन शुद्धि


सत्येन शुध्यति वाणी मनो ज्ञानेन शुध्यति । गुरुशुश्रूषया काया शुध्दिरेषा सनातनी ॥ अर्थ  : वाणी सत्यसे, मन ज्ञानसे, काया गुरुकी सेवासे शुध्द होती है, ये सनातन शुद्धि है ।

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