
श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः सः पन्थाः ॥ – महाभारत
अर्थ – वेद और धर्मशास्त्र अनेक प्रकारके हैं । कोई एक ऐसा मुनि नहीं है जिनका वचन प्रमाण माना जाय । अर्थात श्रुतियों, स्मृतियों और मुनियोंके मत भिन्न-भिन्न हैं । धर्मका तत्त्व अत्यंत गूढ है – वह साधारण मनुष्योंकी समझसे परे है । ऐसी दशामें, महापुरूषोंने अथवा अधिकतर श्रेष्ठ लोगोंने जिस मार्गका अनुकरण किया हो, वहीं धर्मका मार्ग है, उसीको आचरणमें लाना चाहिए ।
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वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजानन्तुं मा व्यवच्छेसीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र १)
अर्थ – वेदके शिक्षणके पश्चात् आचार्य, आश्रमस्थ शिष्योंको अनुशासन सिखाता है । सत्य बोलो । धर्मसम्मत कर्म करो । स्वाध्यायके प्रति प्रमाद मत करो । आचार्यको जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा से) लाओ और संतान-परंपराका छेदन न करो (अर्थात गृहस्थ बनकर संतानोत्पत्ति कर पितृऋणसे मुक्त हो) । सत्यके प्रति प्रमाद (भूल) न हो, अर्थात् सत्यसे विमुख न हो । धर्मसे विमुख नहीं होना चाहिए । जिससे मंगल हो, ऐसे कार्योंकी अवहेलना न की जाए । ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले मंगल कर्मोंसे विरत नहीं होना चाहिए । स्वाध्याय तथा प्रवचन कार्यकी अवहेलना न करें ।
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सुजनो न याति वैरं परहितनिरतो विनाशकालेऽपि | छेदेऽपि चन्दनतरुः सुरभयति मुखं कुठारस्य || – भर्तृहरि
अर्थ : साधु पुरुष सदैव दूसरोंका कल्याण करने हेतु सलग्न रहते हैं, वे अपने विपत्तिके कालमें भी वैमनस्यकी भावना नहीं लाते जैसे चन्दनकी लकडीको काटने हेतु प्रयोगकी गई कुल्हाडीकी लोहेकी पत्तीसे भी चन्दनकी सुगंध आती है |
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥ – नीतिशतक
अर्थ : आलस्य ही मनुष्यके शरीरमें उपस्थित सबसे बडा शत्रु है | उद्यमके (परिश्रम) समान कोई मित्र नहीं होता और जो उद्यमी होता है उसे कभी कष्ट नहीं होता |
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यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः । चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥
अर्थ : जो चित्तमें हो वही वाणीसे प्रकट होना चाहिए और जो वाणीसे प्रकट हो उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए | जिनके चित्त, वाणी और कर्ममें एकरूपता होती है वही साधुजन होते हैं |
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अति समयोचित व उपयोगी प्रस्तुति | धन्यवाद |