ज्ञान प्राप्ति जिससे भी हो, वे हमसे श्रेष्ठ होते हैं, चाहे उनकी आयु हमसे अल्प (कम) क्यों न हो और ज्ञान देनेवाला व्यक्ति वात्सल्य भावसे ही ज्ञान देता है; अतः हमारे धर्मशास्त्रोंमें ज्ञान देनेवालेको पिता तुल्य और जन्म देनवाले पितासे भी अधिक उच्च स्थान दिया गया है । इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिमें एक श्लोक यह तथ्यकी […]
काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च | अल्पाहारी गृहत्यागि च एतद्विद्यार्थि लक्षणम् || अर्थ : कौवे समान दृष्टि, बगुले समान ध्यान, कुत्ते समान निंद्रा, अल्प आहार, गृह त्यागी( विद्यार्जन हेतु गुरु -गृहमें वास करना) यह सब अच्छे विद्यार्थीके लक्षण हैं |
सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः। विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम्॥ अर्थ : सर्वश्रेष्ठ लाभ संतोषकी प्राप्ति है, सर्वश्रेष्ट गति सत्संग है | शुद्ध विचार परम […]
यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीरपि । निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ॥ अर्थ : जहां विद्वान पुरुष नहीं होते वहां एक मंद बुद्धिवाला भी प्रशंसा प्राप्त करता है जैसे जहां वृक्ष नहीं होते वहां एरण्डका पौधा भी वृक्ष प्रतीत होता है |
नाहारं चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते – चाणक्य नीति अर्थ : ज्ञानी अपने आहारकी चिंता नहीं करता, मात्र धर्मका चिंतन करता हैं; क्योंकि उसे पता होता है कि उसके आहारका नियोजन उसके जन्मके समय ही हो जाता है |
परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च | आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै || – महाभारत अर्थ : दुसरोंको दु:ख देकर, धर्मका उल्लंघन करकर या स्वयंका अपमान सहकर मिले हुए धनसे सुख नहीं प्राप्त होता है |
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियं । तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृते पात्रादिवोदकं ।। – मनुस्मृति अर्थात पञ्चज्ञानेन्द्रियों तथा पञ्चकर्मेन्द्रियोंमेंसे किसी भी एक इन्द्रियोंके विषयोंमें रुचि होनेसे वह उसमें प्रवृत्त होने लगती है, इससे तत्त्वज्ञानी व्यक्तिका सारा विवेक एवं साधना धीरे–धीरे उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे एक छोटा सा छिद्र होनेपर पात्रका सारा जल शनै: […]
हातुमिच्छति संसारं रागी दु:खजिहासया । वीतरागो हि निर्दु:खसतस्मिन्नपि न खिद्यति ।। – अष्टावक्र गीता जो संसारमें आसक्त हैं वे संसारका परित्याग अपने कष्टोंसे भागने हेतु करना चाहते हैं किन्तु जो अनासक्त हैं वे दु:खोंसे मुक्त होते हैं और उन्हें संसार […]
पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत न कारयेत | मालाकार इवारामे न यथागंगारकार: || – विदुर निति अर्थ : जैसे माली बगीचेमें एक-एक फूलको ग्रहण करता है; किन्तु मूलसे उनका उच्छेद नहीं करता, उसीप्रकार अंगार कारक वृक्षोंको समूल नाश करके कोयला बनता है, वैसे प्रजाका समूल उच्छेद कदापि न करें |
आसंयोगात् पापकृतांपापांस्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात् । शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावान्न मिश्र: स्यात् पापकृद्भि कथंचित् ।। पुण्यस्य लोको मधुमान् धृतार्चिर्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभि: । तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न् तत्र मृत्युर्न जरा नोत दु:खं ।। पापस्य लोको निरयोSप्रकाशो नित्यं दु:खं शोकभूयिष्ठमेव । तत्रात्मानं शोचति पापकर्मा बह्वीः समा: प्रत्पन्नप्रतिष्ठ: ।। – महाभारत शांतिपर्व […]