हातुमिच्छति संसारं रागी दु:खजिहासया ।
वीतरागो हि निर्दु:खसतस्मिन्नपि न खिद्यति ।। – अष्टावक्र गीता
जो संसारमें आसक्त हैं वे संसारका परित्याग अपने कष्टोंसे भागने हेतु करना चाहते हैं किन्तु जो अनासक्त हैं वे दु:खोंसे मुक्त होते हैं और उन्हें संसार भी कष्टप्रद नहीं लगता है ।
सुख और दु:खकी अनुभूति विषयोंसे आसक्तिके करना होती है जो साधना कर अपने षडरिपुपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनका मन पर्वतकी गुफओंमें भी स्थिर रहता है और संसारके माया रूपी बगीचेमें भी । माया बुरी नहीं है, मायासे आसक्ति बुरी होती है ।
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