दोष एवं अहंके लक्षण


इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियं ।
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृते पात्रादिवोदकं ।। – मनुस्मृति

अर्थात पञ्चज्ञानेन्द्रियों तथा पञ्चकर्मेन्द्रियोंमेंसे किसी भी एक इन्द्रियोंके विषयोंमें रुचि होनेसे वह उसमें प्रवृत्त होने लगती है, इससे तत्त्वज्ञानी व्यक्तिका सारा विवेक एवं साधना धीरे–धीरे उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे एक छोटा सा छिद्र होनेपर पात्रका सारा जल शनै: शनै: बह जाता है और पात्र रिक्त हो जाता है ।
भावार्थ – मेरुतन्त्र नामक शास्त्र अनुसार हिन्दूकी परिभाषा है –  ‘हिनानि गुणानि दूषयति इति हिन्दू’ जिसका अर्थ है साधनाके रूपमें अपने हीन गुणों (दोषोंको) नष्ट कर दिव्य गुणोंको आत्मसात करनेवालेको हिन्दू कहते हैं ।  अपने दोष एवं अहंके प्रतिबिम्बित होनेवाले लक्षणपर एक साधकने एक सतर्क योद्धा समान ध्यान देना चाहिए, अन्यथा विषयोंके प्रति किञ्चित मात्र भी आसक्ति उसकी साधनाके सारे तपोबलको नष्ट कर सकता है । इतिहास साक्षी है कि अनेक उन्नत अर्थात आध्यात्मिक दृष्टिसे अच्छे साधकका अध:पतन उनके मात्र एक दोषके कारण हुआ है; इसलिए साधकने सदैव अपना आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए और अपने मनके संस्कारोंके विरुद्ध अपने संग्राममें मोक्ष पाने तक निरन्तरता बनाए रखना चाहिए । ध्यान रहे, अधिकांश बडी दुर्घटनाएं दक्ष चालकद्वारा तब होती है, जब उनका आत्मविश्वास, अति आत्मविश्वासमें परिवर्तित हो जाता है ।



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