शास्त्र वचन

ब्रह्म स्वरूप


यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ – कथा उपनिषद अर्थ : जब हृदयमें वास करनेवाली सारी इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं तब यह नश्वर मनुष्य अमरत्वको प्राप्त कर लेता है और ब्रह्म स्वरूप हो जाता है !

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तृष्णा


सर्व संसार दोषाणां तृष्णैका दीर्घदु:खदा | अन्तः पुरस्थ मपि य योजयत्यतिसंकटे || – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१७-३२) अर्थ : संसारके सर्व दोषोंमें तृष्णा सर्वाधिक दीर्घ कालके लिए कष्ट देता हैं | वह तो महलोंके अंतःपुरके निवासीको भी संकट दे सकता है |

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अपने देशका सुख


न तादृग्जायते सौख्यमपि स्वर्गे शरीरिणाम् । दारिद्रयेऽपि हि यादृक् स्यात्स्वदेशे स्वपुरे गृहे ॥ – पंचतंत्र                                   अर्थ – शरीरधारियोंको ऐसा सुख स्वर्गमें भी नहीं मिलता, जैसा कि दरिद्र होनेपर भी अपने देश, ग्राम और घरमे मिलता है।

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अपनी आवश्यकतासे अधिक धनका सदुपयोग करना सीखें !


श्री: सुखाय भगवन्दु:खायैव हि वर्धते ll गुप्ता विनाशनं धत्ते मृतिम् विषलता यथा ll  – श्री वशिष्ठदर्शनं (१.१३.१०) अर्थ : धन सुख भोगनेके लिए नहीं है ।  यह जब वृद्धिंगत होता है तो दुख लाता है और यदि इसका एकत्रीकरण किया जाए तो विनाश करता है, जैसे एक विषलता मृत्यु देती है । भावार्थ : ईश्वर हमें […]

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सन्त सान्निध्यका महत्त्व


‘सन्तोंका संग’ यह सर्वश्रेष्ठ स्तरका सत्संग माना गया है, सन्त यदि वाणीसे कुछ न भी बोलेंं तो भी उनके शरीरसे प्रक्षेपित होनेवाले सूक्ष्म स्पन्दनोंके विकिरणसे सामान्य व्यक्तिके चारों सूक्ष्म देहोंकी (मनोदेह, वासना-देह, कारण-देह, महाकारण-देह) शुद्धि होती है एवं सन्तोंकी आज्ञापालन कर, साधना करनेसे जीवके संचित कर्म नष्ट होने लगते हैं; अतः सन्तोंको परब्रह्मकी उपाधि दी […]

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पूरा विश्व ही कुटुम्ब


अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ – हितोपदेश अर्थ : यह मेरा है वह तेरा है यह सब ओछे व्यक्तिकी मनसिकता की उपज है ! उदार चरित्रवालेके लिए पूरा विश्व ही कुटुंब होता है !

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एकांतवाससे चित्त वृत्तियोंका निषेध संभव !


एकांतस्थितिरिंद्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतस: संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना | तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिन स्त्स्माच्चित्तनिरोश एव सततं कार्य: प्रयत्नानान्मुने || – विवेक चुडामणि अर्थ : एकांतमें रहना इंद्रिय–दमनका कारण है, इंद्रिय दमन चित्तके निरोधका कारण है और चित्त-निरोधसे वासनाका नाश होता है तथा वासनाके नष्ट हो जानेसे योगीको ब्रह्मानन्दरसका अविचल अनुभव होता है; इसलिए मुनिको सदा प्रयत्नपूर्वक […]

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पृथ्वी किसके प्रभावसे टिकी है ?


            दोषहेतूनशेषांच्श वश्यात्मा यो  निरस्यति । तस्य धर्मार्थकामानां हानिर्नाल्पापि जायते । सदाचाररतः प्राज्ञो  विद्याविनयशिक्षितः । पापेऽप्यपापः परुषे ह्यभिधत्ते प्रियाणी यः । मैत्रीद्रवान्तःकरणस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ।। ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा  न   गोचरे । सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता  मही ।। (विष्णु० ३। १२ । ४०-४२ )                    […]

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नाम सुमिरन


कलियुग की सर्वश्रेष्ठ साधना नामसंकीर्तनयोग है | उठते -बैठते और अपने सर्व दैनिक कार्य करते समय नाम सुमिरन करते रहने से हमारी आध्यात्मिक प्रगति होती है | नाम के प्रति भक्ति ही भक्तों की शक्ति होती हैं | राम नाम की महिमा : * नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥ भगति सुतिय […]

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आंतरिक अंधकार


उद्यन्तु शतमादित्या उद्यन्तु शतमिन्दव न विना विदुषां वाक्यैर्नश्यत्याभ्यन्तरं तमः ॥ – सभारञ्जन शतक                                                    अर्थ : चाहे सौ सूर्य उदित हो जाये या सौ चंद्रमा; परंतु ज्ञानीके शब्द सुने बिना आंतरिक […]

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