शास्त्र वचन

कर्मठ एवं गुणी व्यक्ति होते हैं अधिक सम्मानके पात्र


कुसुमं वर्णसंपन्नंगन्धहीनं न शोभते । न शोभते क्रियाहीनं मधुरं वचनं तथा ।। अर्थ : जिस प्रकार सुगंध विरहित पुष्प शोभायान नहीं होता ( पुष्पमें यदि सुगंध हो तो उसकी उपयोगिता अधिक होती है) उसी प्रकार अकर्मण्य व्यक्तिके मधुर वचन प्रसंशनीय नहीं होते । कहनेका तात्पर्य है कि मात्र सुमधुर वचनोंसे कोई प्रिय नहीं होता, उनके […]

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अपनेसे आयुमें श्रेष्ठको उठकर प्रणाम करे


भारतीय संस्कृतिकी प्रत्येक धर्माचरणकी कृतिके पीछे सूक्ष्म अध्यात्म शास्त्रीय कारण है, जिसे साधनाके तपोबलसे समझा जा सकता है । अपनेसे आयुमें श्रेष्ठको उठकर प्रणाम करनेसे क्या लाभ होता है ?, यह मनुस्मृतिके इस श्लोकसे ज्ञात होगा । ऊर्ध्वम् प्राणा ह्युत क्रामन्ति यूनः स्थविर् आयति । प्रत्युत्था नाभिवदभ्याम् पुनस्तान्प्रतिपद्यते ।। – मनुस्मृति महर्षि मनु अनुज या […]

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १६)


यदि हमें हमारे प्रारब्धकी तीव्रताको सहजतासे सहन करना हो या अपने संचित कर्मोंको नष्ट करना हो तो दोनों ही स्थितियोंमें नामजप एक सरल माध्यम है । नामजपसे प्रारब्धकी तीव्रताका प्रभाव ऐसे न्यून होता है जैसे कोई कोयलेकी अग्निपर चल रहा हो और तेज (अग्नि) तत्वकी सिद्धि होनेके कारण उसे अग्निकी उष्णताका प्रभाव नहीं पड रहा […]

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ईश्वर रक्षा करते हैं


न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ।। पशुपालकके समान ईश्वर दंड(लाठी) लेकर किसीकी रक्षा नहीं करते, परंतु वे जिनकी रक्षा करना चाहते हैं उन्हें वे सद्बुद्धि देते हैं; जिससे वे अपनी रक्षा कर सके।

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सुभाषित


क्षणश: कणश्चैव विद्याम् अर्थं च साधयेत् । क्षणे नष्टे कुतो विद्या , कणे नष्टे कुतो धनम् ।। अर्थ : मनुष्यने प्रत्येक क्षण सीखना चाहिए और प्रत्येक कण अर्जन करना चाहिए । यदि एक क्षण भी व्यर्थ किया तो विद्या कैसे प्राप्त होगी और एक कण भी नष्ट किया तो धन कैसे प्राप्त होगा !  

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सबसे बडा आश्चर्य ।


अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥  – महाभारत, वन पर्व अर्थ : प्रतिदिन अनेक जीवात्माएं यमलोक जाती हैं अर्थात उनकी मृत्यु होती है , तब भी शेष अमर होनेकी इच्छा रखते हैं इससे बडा आश्चर्य और क्या हो सकता है !  

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शिव और गुरु


शिव एको गुरुसाक्षात् गुरुरेव शिव स्वयं | उभयोरन्तरं किंचित् न द्रष्टव्यं मुमुक्षुभि || – श्रीगुरुगीता                                         अर्थ : भगवान शिव ही साक्षात गुरु हैं और गुरु ही स्वयं भगवान शिव हैं | मुमुक्षुने इन दोनोंमें तनिक भी भेद […]

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दुर्जनका विष


तक्षकस्य विषम दंते मक्षिकायास्तु मस्तके | वृश्चिकस्य विषम पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम || – चाणक्य नीति अर्थ : तक्षकका विष उसके दांतमें होता है, मधुमक्खीका विष उसके मस्तकपर होता है | बिच्छूका विष उसके पूंछमें होता है और दुर्जनका विष उसके सभी अंगोंमें होता है !  

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अतिथि-सत्कार


गृहस्थानां परो धर्मों नान्योsत्यतिथिपूजनात् । अतिथेर्न च दोषोsस्ति तस्यातिक्रमणेन च ।। गृहस्थोंके लिए अतिथि-सत्कारसे बढकर दूसरा कोई महान धर्म नहीं है । अतिथिसे महान कोई देवता नहीं है, अतिथिके उल्लंघनसे बडा भारी पाप होता है ।

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धर्मका पक्ष


यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा । धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत ।। द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके । कामात्मता खल्वपि न् प्रशस्ता ।। वस्तुतः एक ओर जिसमें सब हो; परन्तु धर्म न हो और दूसरी ओर जिसमें केवल धर्म हो और कुछ न हो तो केवल धर्मका ही पक्ष ग्रहण कर उसीका अनुष्ठान करना चाहिए; क्योंकि अर्थपरायण प्राणी अकारण ही सबका द्वेषी […]

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