शास्त्र वचन

मन, वचन और कर्मद्वारा किया गया त्रिविध पापकर्म


 परद्रवयेष्वभिध्यानम मनसाsनिष्टचिंतनं । वितथाभिनिवेषश्च त्रिविधम कर्म मानसं ।। मनुस्मृति (१२:५) पराई धन संपत्तिको हथियानेकी चाह, दूसरे व्यक्तिके अनिष्ट की इच्छा और परलोकमें विश्वास न करना, ये तीनों मनद्वारा किए जानेवाले पाप हैं । ***** पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यम चापि सर्वश: । असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्ग्मयं स्याच्चतुर्विधम ।।मनुस्मृति (१२:६) निरर्थक प्रलाप, चुगली करना, झूठ बोलना एवं कठोर वचन, ये […]

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विद्या एक गुप्त धन समान है


कामधेनुगुणाविद्या ह्यकाले फलदायिनी प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तंल धनं स्मृतम् – चाणक्य नीति  अर्थ : विद्या में दिव्य कामधेनु समान गुण है जो विपत्ति के समय फल देकर साथ देती है । यह मांं समान है , अपने घर से दूर विद्या एक गुप्त धन समान है !

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सर्व श्रेष्ठ भक्त ही गुरुसेवा कर सकता है !


यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्य धिगच्छति । तथा गुरु गतां विद्यां शुश्रूषूरधिगच्छति ।। – मनुस्मृति (2:222) अर्थ : जिस प्रकार खनित्रसे ( भूमि खोदने वाला यंत्र कुदाल ) धरतीको खोदता हुआ मनुष्य जलको प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार गुरुकी सेवा करते रहनेसे शिष्य गुरुकी विद्याको सहज ही प्राप्त कर लेता है । भावार्थ : […]

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ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देती है


यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।  ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ भावार्थ : क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको भस्ममय कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देती है ।  

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श्रेष्ठ मनुष्य


अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तम:।  धर्मोपदेशविश्यातं कार्याऽकार्याशुभाशुभम्।। – चाणक्य नीति धर्म का उपदेश देनेवाले, कार्य-अकार्य, शुभ-अशुभ को बतानेवाले इस नीतिशास्त्र को पढ़कर जो सही रूप में इसे जानता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य है।

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संतसंगकी महिमा


यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्। शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस् तथा।।          अर्थ : अग्निका आश्रय लेनेवाले को ठंड, अंधकार या भय नहीं रहता, उसी प्रकार संतोंकी सेवा करने वालेको पापरुपी शीत, जन्म-मृत्यु रुपी भय और अज्ञानरुपी अन्धकार नष्ट हो जाता है । ******* निमज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्। संतो ब्रह्म-विदः शांता नौर् दृढेवाप्सु मज्जताम्।। […]

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महर्षि व्यास ! आपको सादर वन्दन है


नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र । येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयप्रदीपः।। हे महर्षि व्यास  ! आपको सादर वंदन है , आपने अपने विशाल नेत्र और व्यापक ज्ञान से महाभारत रूपी दीप अपने ज्ञान स्वरूपी तेल से प्रज्ज्वलित किया !

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भगवान केवल निष्काम प्रेम -भक्तिसे ही प्रसन्न होते हैं


नालं द्विजत्वं देवत्वमृषित्वं वासुरात्मजाः । प्रीणनाय मुकुन्दस्य न वृत्तं न बहुज्ञता ॥ न दानं न तपो नेज्या न शौचं न व्रतानि च । प्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिरन्यद् विडम्बनम् ॥ दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा वजौकसः । खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ – (श्रीमद्धा ७ । ७ । ५१-५२, ५४)‘ ‘दैत्यबालको ! भगवानको प्रसन्न करनेके लिये […]

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आत्मा


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ – श्रीमद्भगवद् गीता भावार्थ : इस आत्माको शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकती ।

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प्रत्येक व्यक्तिकी कोई विशेषता होती है


नाक्षरं मंत्ररहीतं नमूलंनौषधिम् । अयोग्य पुरूषं नास्ति योजकस्तत्रदुर्लभ: ।। एक भी अक्षर ऐसा नहीं जो मन्त्र नहीं बन सकता, एक भी ऐसा जड नहीं जो औषधि नहीं बन सकती है और एक भी ऐसा पुरुष नहीं जो पूर्णत: अयोग्य हो; परन्तु ऐसे व्यक्ति दुर्लभ है, जो उनकी उपयोगिताको जानकार उनकी विशेषताका सदुपयोग करे !  

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