धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेन परिपालयेत् । धर्म मूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते – विदुर नीति अर्थ : राजाको चाहिए कि धर्मसे राज्यको प्राप्त करें और धर्मसे राज्यका पालन-पोषण करे । धर्ममूलक ऐश्वर्यको प्राप्त होकर, वह राजा न ऐश्वर्यको छोडता है और न ही ऐश्वर्यके द्वारा छोडा जाता है ।
सर्प: क्रूर: खल: क्रूर: सर्पात् क्रूरतर: खल: । सर्प: शाम्यति मन्त्रैश्च दुर्जन: केन शाम्यति ।। अर्थ : सर्प क्रूर होता है और उसी प्रकार दुर्जन भी क्रूर होता है; परन्तु दुर्जन अधिक क्रूर होता है क्योंकि सर्पको नियंत्रित करनेका कोई उपाय (जैसे मंत्र शक्तिद्वारा) किया जा सकता है; परन्तु दुर्जनको नियंत्रित करनेका कोई उपाय नहीं होता !
नमन्ति फलिनो वॄक्षा नमन्ति गुणिनो जना: । शुष्ककाष्श्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन ।। अर्थ : गुणवान व्यक्ति नम्र होता है जैसे फल से लदा वृक्ष सदैव झुका रहता है और मूर्ख सूखे काष्ट समान सदैव अकडा रहता है वह कभी नहीं झुकता ।
अवध्यः सर्वब्रह्मभूता अन्तरात्मा न संशयः अवध्ये चात्मनि कथं वध्यॊ भवति केन चित !!१!! यथा हि पुरुषः शालां पुनः संप्रविशेन नवाम एवं जीवः शरीराणि तानि तानि परपद्यते !!२!! देहान पुराणान उत्सृज्य नवान संप्रतिपद्यते एवं मृत्युमुखं पराहुर ये जनास कर्मफलर्दर्शिनः !!३!! ये चल एवं अचल ब्रह्माण्ड सभी प्रकारके प्राणियोंके लिए भोजन उपलब्ध कराता है, ये व्यवस्था श्रीहरिद्वारा […]
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रश्चैव दक्षिणम् । वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। – श्रीविष्णुमहापुराण अर्थ : जो समुद्रके उत्तरमें तथा हिमालयके दक्षिणमें है, उस देशका नाम भारत है और भारत् वंशी, उनकी संतान भारतीय हैं ।
विद्वान् पथः पुरएत ऋजु नेषति । – ऋग्वेद विद्वान गण पुरोगामी होकर सरल पथसे मनुष्योंका नेतृत्व करें। ***** रयिं जागृवांसो अनुग्मन्। – ऋग्वेद जागरुक जन ऐश्वर्य पाते हैं। **** श्रद्धायाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः। – ऋग्वेद श्रद्धासे ब्रह्म तेज प्रज्वलित होता है और श्रद्धापूर्वक ही हवि अर्पण किया जाता है।
मनुमृतिको बिना समझें उसे जलानेवाले धर्मद्रोहियोंके लिए यह श्लोक पठनीय है और वे अज्ञानताके अभावमें किस प्रकारसे अधर्म करते हैं यह समझमें आता है ! निषेकादिश्मशानान्तो मंत्रैर्यस्योदितों विधि: । तस्य शास्त्रेsधिकारोsस्मिन्यज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित ॥- मनुस्मृति अर्थ : मनुष्यके जन्मसे लेकर मृत्यु तकके संस्कारोंका वर्णन, वेदके जिस प्रकरणमें है उसीको मनुस्मृतिमें लिया गया है, हमने उसके […]
एक बार एक ईसाई बने हिन्दूने मुझसे कहा, “ईसाई धर्म सबसे महान धर्म है, वह मानवताका प्रसार करता है ।” मैंने पूछा, “क्या आपने हिन्दू धर्मका त्याग करनेसे पूर्व किसी सन्तकी शरणमें रहकर साधना की या धर्म शास्त्रोंका अभ्यास किया ?” उन्होंने कहा, “नहीं ।” मैंने कहा, “अपनी धृष्टतापूर्ण वक्तव्य हेतु क्षमा चाहती हूं; किन्तु […]
पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा – चाणक्य नीति अर्थ : चतुर व्यक्ति सारे वेदों और अनेक धर्मग्रंथोंको पढता है; परंतु उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं हो पाता; जैसे कढ़छी जो भोजन पकानेमें सहायता करती है; उसे भोजनका स्वाद नहीं पता होता ।
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्रणिनां आर्तिनाशनम् ॥ अर्थ : न ही मुझे राज्य चाहिए , न ही स्वर्ग का सुख और न ही मोक्ष चाहिए, सर्व प्राणीके कष्टोंके निवारण हो यह अवश्य ही इच्छा है !