निश्चित्य य: प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मण: ।अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित: उच्यते ।।- विदुर नीति अर्थ : जो व्यक्ति कर्मको अपना कर्तव्य मानकर निश्चयसे आरंभ करता है, कर्मको मध्यमें नहीं छोडता और उसे समाप्त कर ही रहता है और जितेंद्रिय होता है, वही पंडित कहलाने योग्य होता है।
अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे । पावको लोहसंगेन मुद्रगरैरभिताद्यते ।। अर्थ : दुर्जनोंका संगत करनेवालेको बार-बार अपमान सहन करना पडता है, जैसे लोहेके संग करनेवाले स्वर्णको बार-बार पीटा जाता है ।
नदीषु देव खातेषु तडागेषु सर:सु च । स्नानं समाचरेन्नित्यम गर्त्तप्रस्त्रवनेषु च ।। – मनुस्मृति (४:२०३) अर्थ : नदियों, प्राकृतिक सरोवरों तथा मनुष्यद्वारा तालाब, पोखर , कुंआ आदिमें व्यक्तिको सदैव स्नान करना चाहिए !
मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहु मानयन् । वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ।। अर्थ : समस्त भूत-प्राणियोंमें सर्वेश्वर भगवानने ही अपने अंशभूत जीवके रूपमें प्रवेश किया है, यह मानकर सब प्राणियोंको अत्यंत आदर देते हुए सबको मन ही मन प्रणाम करना चाहिए । भावार्थ : वैदिक संस्कृतिमें जब हम किसीको नमस्कार करते हैं तो हमारा मनोभाव यही होता है कि […]
भक्तं वा भजमानं त्वास्मीति च वादिनम् । त्रीनेतान् शरणं प्राप्तान् विषमेऽपि न् संत्यजेत् ।। – महाभारत अर्थ : भक्त, सेवक, और ‘मैं तुम्हारा हूं’ ऐसा कहनेवाला तीनों शरणागतोंको संकटकालमें भी नहीं छोडना चाहिए ।
जनक उवाच : कथं ज्ञानंवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति । वैराग्यं च कथं प्राप्त्मेतद् ब्रुहि मम् प्रभो ।। – अष्टावक्र गीता अर्थ : नृप एवं जिज्ञासु जनकके कहा हे प्रभु कृपया मुझे सिखाएं, ज्ञानकी प्राप्ति कैसे हो ? मुक्ति कैसे प्राप्त हो ? और वैराग्यकी प्राप्ति कैसे हो ? ***** अष्टावक्र उवाच : मुक्तिमिच्छसि चेत्तात् विषयान् विशवत्त्यज् […]
मरणान्तानि वैराणि निवॄत्तं न: प्रयोजनम् ।क्रीयतामस्य संस्कारो ममापेष्य यथा तव ।। अर्थ : “शत्रुके मृत्युके पश्चात उससे शत्रुता समाप्त हो जाती है। अब वह जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है अतः उसका योग्य प्रकारसे अंतेयष्टि संस्कार करो” – ये शब्द प्रभु श्रीरामने विभीषणको रावणके मृत्युके पश्चात तब […]
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरम् कलिरेव च । राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ।। – मनुस्मृति अर्थ : राजाके चेष्टाओं एवं प्रवृत्तिके नाम हैं – सत्ययुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग । राजाको ही युग कहा गया है अर्थात् वह राज्यकी जैसी व्यवस्था करता है युगको उसी प्रकारका नाम दिया जाता है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ अर्थ : धनकी तीन ही गति होती है, दान भोग या नाश, जो धनका सदुपयोग दानमें या स्वयंके सुख हेतु नहीं करते हैं, उनका धन तीसरी गति अर्थात् नाशको (चोरी, धोखाधडी, अग्नि, रोग या लूटके माध्यमसे) प्राप्त […]
आचार्यपुत्र: शुश्रूषु: ज्ञानदो धार्मिकः शुचि: । आप्त:शक्तोऽर्थद: साधु: स्वाऽध्याप्योदश धर्मतः ।। – मनुस्मृति (२:११२) अर्थ : गुरुके अनुसार दस श्रेणीके व्यक्ति धर्मका ज्ञान देने योग्य होते हैं – १. आचार्यपुत्र, २. सेवा करनेवाला अर्थात् पुराना सेवक, ३. ज्ञान देनेवाला अध्यापक, ४. आचारवान तथा धर्मात्मा व्यक्ति, ५. पवित्र आचरण करनेवाला ६. सत्य बोलनेवाला ७. समर्थ पुरुष […]