शास्त्र वचन

अतिथि और आतिथ्य


एक रात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मण: स्मृत: । अनिन्यं  हि स्थितो  यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ।।- मनुस्मृति एक रात्रि गृहस्थके गृह ठहरनेवाला ब्राह्मण ही अतिथि कहलाता है क्योंकि उसके आनेकी कोई तिथि निश्चित नहीं। अतः एक रात्रिसे अधिक ठहरनेवाला ब्राह्मण अतिथि नहीं है । यहां ब्राह्मणका अर्थ सज्जन व्यक्ति है, पूर्वकालमें ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी या सन्यासी ही अधिकतर भ्रमण किया करते […]

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सत्यनिष्ठ होकर धर्मके मार्गका अनुसरण करें


पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्ध: सुखं वसेत् ।यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्यं सुखं वसेत् ।। – विदुर नीति अर्थ : मनुष्यको चाहिए कि आयुके पूर्वार्धमें ऐसा कर्म करें जिससे वृद्धावस्थामें वे सुखी रहे और आजीवन ऐसे कार्य करे कि मृत्यु उपरांत परलोकमें भी सुखी रहे । भावार्थ : उपर्युक्त श्लोकके ठीक विपरीत आजकी युवा […]

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ऊंटोके विवाहमें गधे गाना गा रहे हैं


उष्ट्राणां हि विवाहेषु गर्दभाः शान्तिपाठकाः। परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपं अहो ध्वनिः ।। अर्थ : ऊंटोके विवाहमें गधे गीत गा रहे हैं। दोनों एक दूसरेकी प्रशंसा कर रहे हैं वाह क्या रूप है (ऊंटका), वाह क्या सुर है (गधेकी)। यथार्थमें देखा जाए तो ऊंटोंमें सौंदर्यके कोई लक्षण नहीं होते, न ही गधोंमे अच्छे स्वरके; परन्तु कुछ […]

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मन वाणीसे किये गए शुभ या अशुभ कर्म


शुभाशुभंफलं कर्म मनोवाग्देह संभवं । कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमा ।। – मनुस्मृति ( 12:3 ) अर्थ : मनुष्य अपने मन वाणीसे जो भी शुभ या अशुभ कर्म करते हैं , तदनुसार वे उत्तम, मध्यम या निम्न योनिको प्राप्त होते हैं !

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गुरुके श्रीमुखमें शब्द-ब्रह्मका होता है वास


गुरुवक्त्रे स्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् पुरूषं स्वैरिणी यथा ।। अर्थ : गुरुके श्रीमुख में शब्द-ब्रह्मका वास होता है और उनकी कृपासे ही ब्रह्मकी (अर्थात आत्मज्ञानकी) अनुभूति होती है। गुरुका ध्यान सदैव करना चाहिए जिस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री मात्र अपने पतिका ध्यान सदैव करती है।

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राजधर्म


चात्रो धर्मो प्रयादिदेवात् प्रवृत्त: । पश्चात् अन्ये शेषभूताश्च धर्मा: ।। — महाभारत १२.६४.२१ अर्थ : परमेश्वरने सर्वप्रथम राजधर्म प्रतिपादित किया व तत्पश्चात धर्मकी अन्य संहिताएं सम्मिलित कीं ।

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संतों की वाणी


संतों की वाणी अकाट्य और ब्रह्म वाक्य समान होती है उसकी प्रचीति देती यह तुलसीदास रचित रामचरितमानस की यह दोहावली – * बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥ सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥6॥ भावार्थ:-ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी संत […]

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विवेक-बुद्धिके नष्ट होनेसे नाश स्वतः ही हो जाता है


यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ।। – महाभारत ५.३४.८१ अर्थ : जब देवोंको किसीका नाश  करना होता है , वे उनके विवेक बुद्धिको नष्ट कर देते हैं ! उसके पश्चात् उनकी अवनति स्वतः ही हो जाती है !

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नामजपका महत्त्व


तन्मुखम तू महत्तिर्थम तन्मुखम क्षेत्र मेव च, यनमुखे राम रामेति तन्मुखम सार्व कामिकम ।। – पद्मपुराण (उत्तरखण्ड) अर्थ : जिस मुखसे ईश्वरका नामजप होता है, वह मुख महा तीर्थक्षेत्र बन जाता है। वही हमारे शुद्धिका स्थान बन हमारी इच्छाओंकी पूर्ति करता है।

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आस्तिक होना पण्डित होनेका है प्रमुख गुण


आजके अनेक नास्तिक बुद्धिजीवी, व्यावहारिक ज्ञान देनेवाले भारी भरकम निधर्मी ग्रन्थोंको पढकर, देश और विदेशमें उच्च शिक्षा ग्रहण कर भिन्न उपाधियोंसे विभूषित होकर, स्वयंको पण्डित समझते हैं । हमारी वैदिक संस्कृतिमें नास्तिकोंको पण्डित नहीं कहा गया है, नास्तिक तो कृतघ्न होते हैं ! जिस ईश्वरने इस सृष्टिकी रचना की, मनुष्यको जीवन दिया, उसके जीवनयापन हेतु […]

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