एक रात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मण: स्मृत: ।
अनिन्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ।।- मनुस्मृति
एक रात्रि गृहस्थके गृह ठहरनेवाला ब्राह्मण ही अतिथि कहलाता है क्योंकि उसके आनेकी कोई तिथि निश्चित नहीं। अतः एक रात्रिसे अधिक ठहरनेवाला ब्राह्मण अतिथि नहीं है ।
यहां ब्राह्मणका अर्थ सज्जन व्यक्ति है, पूर्वकालमें ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी या सन्यासी ही अधिकतर भ्रमण किया करते थे एवं इन तीन अशरमके व्यक्तिको विप्र समान ही सम्मान या आतिथ्य देना अभिप्रेत है ।
उपासते य: गृहस्था: परपाकमबुद्धय: ।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिन: ।।- मनुस्मृति
जो मंद बुद्धि गृहस्थ अतिथि सत्कार करवानेके लोभमें दूसरे गाँवमें जाकर दूसरे व्यक्तिके यहां भोजन इत्यादि करता है वह मरने के पश्चात भोजन करवानेवालेके यहां पशु बनता है ।
अप्रणोद्योsतिथि: सायं सुर्योढो गृहमेधिना ।
काले प्राप्तस्त्वकाले व नास्यन्श्नन्गृहे वसेत् ।। – मनुस्मृति
सूर्य अस्त के पश्चात असमय आनेवाले अतिथिको भी घरसे बिना भोजन करवाए नहीं भेजना उचित नहीं माना गया है । अतिथि चाहे समय पर आए या असमय आए उसे भोजन करवाना गृहस्थका धर्म है।
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