शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रोनिशितांकुशेन समदो दण्डेन गौर्गर्दभः । व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैः मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम् ॥ अर्थ : अग्निको जलद्वारा बुझाया जा सकता है, सूर्यकी तापसे रक्षण हेतु छतरीका उपयोग किया जा सकता है। अनियंत्रित हाथीको महावतद्वारा अंकुशसे नियंत्रित किया जा सकता है। गाय या गधेको लाठीसे दिशा दिया जा सकता है। व्याधिको औषधिसे […]
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते । जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।। अर्थ : रावणके युद्धमें परास्त कर उसका वध कर , प्रभु श्री रामने माता सीताको मुक्त किए और विभीषणको लंकाकी राजगद्दीपर आसीन किए । उनके भाई लक्ष्मणने उनसे लंकामें कुछ और दिवस रुकनेके लिए कहा; क्योंकि लंका अत्यधिक रमणीय स्थान था। तब प्रभु […]
यह याद रखें जो आपका खरा हितैषी होगा वो झूठमूठ आपकी प्रशंसा नही करेगा हो सकता है वो इतना कठोर बोल दे कि सहन करना कठिन हो जाये; परन्तु वे खरे हितैषी होते हैं । रामचरितमानसमें लिखा है कि – बचन परम हित सुनत कठोरे सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे अर्थात् सम्पूर्ण धरतीपर […]
परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्षणम् । सुहृदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः ॥ – वाल्मीकि रामायण अर्थ : ये तीन दोष विनाशकारी हैं–परद्रव्यहरण, परस्त्रीकी अभिलाषा, और आत्मजनोंपर अविश्वास ।
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वगे विद्रुतो भयात् ।रक्षार्थंमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ।। – मनुस्मृति अर्थ : इस संसारमें राजाके नहीं होनेपर बलबानोंके भयसे लोग भयाक्रांत हो, इधर-उधर भागने लगते हैं । इसी कारणसे भगवानने राजाकी सृष्टि की ।
मन एव मनुष्याणां कारण बन्ध मोक्षयोः । मन ही हमारे बंधन और मन ही मोक्ष का कारण है ! जब मन विषय आसक्ति से जुड़ा रहता है तो हमारे बंधन का कारण बनता है और जब मन विषयों के आसक्ति से विहीन हो जाता है तब वह मोक्ष का कारण बनता है !
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः। देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।। – चाणक्य नीति अर्थ : सारस पक्षीकी भांति एक ज्ञानीजनको समय, स्थान और शक्तिका भान रहता है व वह प्रत्येक कार्यमें सफलता प्राप्त करता है ।
तस्माद्धर्मम् सहायार्थं नित्यं सङ्ग्चिनुयाच्छनै:। धर्मेन हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।। – मनुस्मृति अर्थ : शरीरको त्यागनेके पश्चात धर्म ही मात्र सहायक होता है; अतः आत्मकल्याण हेतु थोडा-थोडा कर धर्मका संग्रह करें । परलोकके घोर अंधकारसे भरे मार्गको जीव संचित धर्मकी सहायतासे ही पार कर सकता है।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥ – बालकांड , रामचरितमानस भावार्थ:-संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहां (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं॥
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत् । मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाsपि नियोजयेत् ।। – चाणक्य नीति अर्थ : मनमें जो भी चिंतन किया है उसे मुखसे बाहर नहीं निकालना चाहिए। उसपर मनन चिंतन कर उसे गुप्त रखना चाहिए और उस विचारको बिना घोषित किए क्रियान्वित करना चाहिए ।