शास्त्र वचन

खरे पिता कहलानेके अधिकारी कौन ?


उत्पादक ब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मद: पिता । ब्रह्म जन्म ही विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।।- मनुस्मृति अर्थ : जन्म देनेवाले और वेद विद्या पढानेवाले दोनों ही व्यक्ति पिता कहलाते हैं; परंतु वेद-विद्याके ज्ञानसे शिष्यका लौकिक और पारलौकिक जीवन दोनों ही सुधरता है; अतः वेद-विद्या देने वालेका महत्व अधिक है। भावार्थ : माता-पिताके ऋणसे मुक्त होना कठिन […]

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अल्पज्ञानसे अहंकार निर्माण होना


चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम् तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥ अर्थ : जब मैं थोडा जाननेवाला बना, तब हाथी जैसा मदांध हुआ; तब मैं सर्वज्ञ हूं, ऐसा समझकर मेरा मन अहंकारी बना; परंतु  जब ज्ञानी लोगोंके संसर्गसे थोडा-थोडा समझने लगा, तब मैं मूर्ख […]

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मित्र कैसा हो


धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।अनुरक्तस्थिरारम्भं लघु मित्रं प्रशस्यते । । अर्थ : मित्र वह अच्छा होता है जो धर्मात्मा हो, कृतज्ञता अनुभव करनेवाला हो, संतोषी स्वभावका हो, स्थिर कार्यका आरम्भ करनेवाला हो तथा अपनेसे छोटा हो । (हमारे धर्मशास्त्रोंमें मित्र कैसा हो ?, इसपर भी कितने सरल शब्दोंमें बताया गया है – तनुजा […]

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नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता


देवता के नाम और उनके स्वरूप में अद्वैत होता है । नाम के द्वारा रूप के साथ प्रीति हो जाती है और स्वरूप से प्रीति होने पर नाम सहज ही स्मरण हो जाता है। स्वरूप से प्रेम हमें नाम सुमिरन की ओर ले जाता है और यही नाम का अखंड सुमिरन हमें सगुण से निर्गुण […]

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शास्त्र वचन


 ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये । सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।। अर्थ : जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठासे इर्ष्या करता है उसकी व्याधिकी कोई औषधि नहीं है।       

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निन्दाका त्याग करें


न चात्मानं प्रशंसेद्वा पर्निन्दां च वर्जयेत् । वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयन्तेन विवर्जयेत् ।। अर्थ : अपनी प्रशंसा न करें तथा दूसरेकी निंदाका त्याग कर दें। वेदनिन्दा और देवनिंदाका यत्नपूर्वक त्याग करें ।

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धर्म क्या है ?


धारणाद्धर्ममित्याहु: धर्मो धारयते प्रजा: । यस्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चय: ।। अर्थ – धर्म शब्दकी उत्त्पत्ति धारणा शब्दसे हुई है। धर्म ही प्रजाको या समाजको धारण कर रखता है। अतः जो व्यक्तिको सांघिक रूपसे धारण कर सके, वह निश्चय ही धर्म है।

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पापकर्मके परिणाम


बहून् वर्ष गणान्गोरान्नरकान्प्राप्य तत्क्षयात् ।संसारन्प्रति पद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ।। – मनुस्मृतिअर्थ : जो प्राणी गंभीर एवं जघन्य पाप करते हैं वे अनेक वर्षों तक नरककी भीषण यतनाओंकी झेलनेके पश्चात् पाप कर्मोंके फलोंका क्षय हो जानेसे पुनः इस संसारमें उत्पन्न होते हैं।

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गुरुकृपा बिना मन:शांति असम्भव !


किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि ।  दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम् ।। – श्री गुरु गीता अर्थ : यहां बतानेकी क्या आवश्यकता है कि बिना अविरल गुरुकृपाके मन:शांति कोटि-कोटि शास्त्रोंके अध्ययन कर भी असंभव है !

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मौन, एक अमोघ अस्त्र


स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः । विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥ – भर्तृहरेः सुभाषितसंग्रह अर्थ : ब्रह्माने सभीके लिए उपलब्ध एक गुण निर्माण किया है और वह है मौन । अज्ञान छिपानेके लिए मौन रूपी एक गुणरूपी आवरण बनाया है; विशेष कर ज्ञानियोंकी सभामें मूर्खोके लिए मौन अलंकार समान है । भावार्थ : मौन मात्र मूढों […]

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