धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।अनुरक्तस्थिरारम्भं लघु मित्रं प्रशस्यते । ।
अर्थ : मित्र वह अच्छा होता है जो धर्मात्मा हो, कृतज्ञता अनुभव करनेवाला हो, संतोषी स्वभावका हो, स्थिर कार्यका आरम्भ करनेवाला हो तथा अपनेसे छोटा हो ।
(हमारे धर्मशास्त्रोंमें मित्र कैसा हो ?, इसपर भी कितने सरल शब्दोंमें बताया गया है – तनुजा ठाकुर)