न चात्मानं प्रशंसेद्वा पर्निन्दां च वर्जयेत् । वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयन्तेन विवर्जयेत् ।। अर्थ : अपनी प्रशंसा न करें तथा दूसरेकी निंदाका त्याग कर दें। वेदनिन्दा और देवनिंदाका यत्नपूर्वक त्याग करें ।
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