ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमो नमः ॥ अर्थ : योगी उस ‘ओंकार’ या ‘प्रणव’ का सतत ध्यान करते हैं जो सर्व इच्छाओं को पूर्ण करता है और मोक्ष प्रदान करता हैं । ओंकार को नमन है !
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। – मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६ अर्थ : जहां स्त्री जातिका आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओंकी पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज तथा परिवारपर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां […]
नाधर्मो विद्यते कश्चित् शत्रुन्हत्वातत्तायिन: । अधर्म्यंयशस्यं च शात्रवाणाम प्रयाचानम ।। – महाभारत ५.३.२१ अर्थ : शत्रुके नाश करनेपर कोई पाप नहीं लगता । इसके विपरीत उसके समक्ष विनती करना अधर्म है और किसीकी कीर्तिके लिए यह करना अपमान समान है ।
सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम् । एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो: ।। अर्थ : जो वस्तुएं अपने अधिकारमें नही है वह सब दु:ख है तथा जो चीज अपने अधिकारमें है वह सब सुख है ।संक्षेपमें सुख और दु:खके यह लक्षण है ।
समाहितो ब्रह्मपरो प्रमादी शुचिस्तथैकान्तरतिर्जितेन्द्रियः: । समाप्नुयाद् योगमिमं महामना विमुक्तिमाप्नोति ततच्श योगत: ।। कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा भाग्यवती च तेन । विमुक्तिमार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेत: ।। – (स्कन्द० मा० कुमा० ५५/१३९-१४०) अर्थ : जो एकाग्रचित; ब्रह्मचिन्तनपरायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकान्तप्रेमी और जितेन्द्रिय है, वह महामना योगी इस योगमें सिद्धि प्राप्त करता है और […]
यन्निमित्तं भवेच्छोकस्तापो वा दु:खमेव च । आयासो वा यतो मूलमेकाङ्गमपि तत्त्यजेत् ।। – महाभारत १२.१७४.४३ अर्थ : जिस कारण क्लेश और कष्ट हो उसका परित्याग कर देना चाहिए चाहे वह शरीरका कोई अंग ही क्यों न हो !
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा संपुस्थितं । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशय: ।। – अष्टावक्र गीता अर्थ : वे निश्चित ही मुक्त होते हैं जो प्रेमसे आवेशित स्त्रीको और मृत्युको निकट देखकर भी स्थिर और अलिप्त रहते हैं ।
आज के पापियों द्वारा किए जा रहे कुकर्मोंको देखकर कुछ व्यक्ति कहते हैं कि उन्हें दण्ड क्यों नहीं मिल रहा है, वे फल फूल क्यों रहे हैं, इस सम्बन्धमें ‘मनुस्मृति’में यह श्लोक पठनीय है – नाधर्मश्चरितो लोके सद्य: फलति गौरिव ।शनैराववर्त्यमानस्तु कर्तुर्मुलानि कृतन्ति ।। – मनुस्मृति अर्थ : पापी व्यक्तिद्वारा किया गया पाप धरतीमें बोए […]
ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभू : । कर्ता हेतु: क्रिया यस्मात् तस्मै ज्ञाप्त्यात्मने नमः ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१-१) अर्थ : ज्ञान रूपी उस परमतत्त्वको नमन है जो ज्ञानी हैं, ज्ञान है और जहांसे ज्ञानपाने वालेकी उत्पत्ति होती है वह भी हैं, उन्हें नमन है जो द्रष्टा हैं, दर्शन हैं और स्थूल दृश्य भी हैं, […]
अधः पश्यसि किं वृद्धे पतितं तं किं भुवि । रे रे मूर्ख न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम् ।। – चाणक्य नीति अर्थ : एक अत्यन्त वृद्ध और कमरसे झुकी हुई स्त्रीसे एक युवकने व्यंग्यात्मक रूपसे पूछा , “ क्या ढूंढ रही हैं कुछ गिर गया है या खो गया है ” ? वृद्ध स्त्रीने कहा, “मूर्ख , देख […]