जिससे व्यथा, तनाव, दुःख व वेदना हो, उसका त्याग करना आवश्यक है
यन्निमित्तं भवेच्छोकस्तापो वा दु:खमेव च । आयासो वा यतो मूलमेकाङ्गमपि तत्त्यजेत् ।। – महाभारत १२.१७४.४३
अर्थ : जिस कारण क्लेश और कष्ट हो उसका परित्याग कर देना चाहिए चाहे वह शरीरका कोई अंग ही क्यों न हो !
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