चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः ।
यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनसकाशादवगतं
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥
अर्थ : जब मैं थोडा जाननेवाला बना, तब हाथी जैसा मदांध हुआ; तब मैं सर्वज्ञ हूं, ऐसा समझकर मेरा मन अहंकारी बना; परंतु जब ज्ञानी लोगोंके संसर्गसे थोडा-थोडा समझने लगा, तब मैं मूर्ख हूं, ऐसा भान हुआ; और मेरा गर्व ज्वर समान उतर गया ।
Leave a Reply