बहून् वर्ष गणान्गोरान्नरकान्प्राप्य तत्क्षयात् ।संसारन्प्रति पद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ।। – मनुस्मृतिअर्थ : जो प्राणी गंभीर एवं जघन्य पाप करते हैं वे अनेक वर्षों तक नरककी भीषण यतनाओंकी झेलनेके पश्चात् पाप कर्मोंके फलोंका क्षय हो जानेसे पुनः इस संसारमें उत्पन्न होते हैं।
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